सेबी ने कैश मार्केट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए फंडों के शुद्ध निपटान की अनुमति देने के अपने पहले के प्रस्ताव को लागू कर दिया है। इसके लिए उसने 31 दिसंबर, 2026 की समयसीमा तय की है। इस कदम का मकसद एफपीआई के लिए नकदी का दबाव कम करना और लेनदेन की लागत घटाना है। ये एफपीआई हाल के वर्षों में भारतीय शेयरों के बड़े बिकवाल रहे हैं।
कारोबारियों ने यह बात उठाई थी कि कस्टोडियन स्तर पर मौजूदा सकल निपटान की व्यवस्था के कारण ज्यादा फंडिंग की जरूरतें और विदेशी मुद्रा से जुड़े खर्च बढ़ जाते हैं, खासकर इंडेक्स के दोबारा संतुलन के दौरान ज्यादा ट्रेडिंग वाले समय में।
संशोधित फ्रेमवर्क के तहत एफपीआई को आउटराइट ट्रांजेक्शन के लिए नेट फंड ऑब्लिगेशन की अनुमति दी जाएगी। आउटराइट वह लेनदेन होता है जिसमें एक निपटान चक्र के भीतर किसी प्रतिभूति की केवल खरीद या केवल बिक्री शामिल होती है। चक्र के दौरान जिन सौदों में एक ही प्रतिभूति को खरीदने और बेचने के लेनदेन होते हैं, उनका निपटान सकल आधार पर ही जारी रहेगा।
नियामक ने साफ किया है कि जहां फंड की देनदारियों को शुद्ध बनाया जा सकता है, वहीं एफपीआई और कस्टोडियन के बीच प्रतिभूतियों का निपटान सकल आधार पर ही जारी रहेगा। प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) और स्टांप ड्यूटी जैसे वैधानिक शुल्क भी उतने ही रहेंगे और डिलिवरी पर लागू होंगे।
सेबी ने कहा कि जिन मामलों में सीधी खरीद, सीधी बिक्री से ज्यादा होती है, वहां एपपीआई को बची हुई रकम के साथ-साथ गैर- शुद्ध आधार वाली देनदारियों के लिए धन देना होगा। लेकिन सीधी बिक्री से मिली अतिरिक्त रकम को नॉन-आउटराइट सौदे से सृजित होने वाली खरीद देनदारियों के साथ समायोजित नहीं किया जा सकता।