डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपये में भारी गिरावट देखकर भारत के धनाढ्य परिवारों का पूंजी बचाने और लगाने का तरीका बदल रहा है। अपनी पूंजी के सुरक्षित निवेश के लिए अब वे डॉलर से जुड़ी परिसंपत्तियां ले रहे हैं और विदेश में पूंजी लगा रहे हैं।
भारत के फैमिली ऑफिस और धनाढ्य व्यक्ति (एचएनआई) पहले अपनी पूंजी देसी शेयर बाजार, सावधि जमा और रियल एस्टेट में लगाते रहे हैं। वेल्थ मैनेजरों का कहना है कि डॉलर की तरफ बढ़ते रुझान को मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के जोखिम से बचने का रास्ता ही नहीं माना जा रहा है बल्कि लंबे अरसे के लिए पूंजी लगाने का नया तरीका भी माना जा रहा है।
वेल्थ मैनेजरों का कहना है कि लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) और गिफ्ट आईएफएससी के जरिये विदेश में निवेश के विकल्पों से अब रकम को सीधे विदेश में लगा दिया जा रहा है और उसके लिए वित्त वर्ष की दूसरी छमाही का इंतजार नहीं किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादा से ज्यादा फैमिली ऑफिस किस तरह विदेश में फैमिली ऑफिस शुरू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से मंजूरी मांग रहे हैं। उनका मकसद विनियमित संस्था के जरिये विदेश में पूंजी लगाने का दीर्घकालिक रास्ता तलाशना है।
पीएल वेल्थ के प्रमुख (प्रोडक्ट ऐंड फैमिली ऑफिस) राजकुमार सुब्रमण्यन ने कहा, ‘यह बदलाव कुछ समय के लिए नहीं है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की लगातार निकासी और पश्चिम एशिया से कच्चे तेल पर पड़ते दबाव की वजह से यह सोचा-समझा और लंबे अरसे तक रहने वाला बदलाव है।’
उन्होंने कहा कि 2026 के पहले पांच महीनों में ही डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 6 फीसदी लुढ़क चुका है जो समूचे 2025 में आई 5 फीसदी और 2024 में आई 2.8 फीसदी गिरावट से ज्यादा है। रुपया 19 मई को पहली बार 96.57 प्रति डॉलर तक गिर गया था। पिछले दो साल में डॉलर के बनिस्बत रुपया 14 फीसदी गिर चुका है। यूरो की तुलना में यह पिछले 12 महीनों में 7 फीसदी से ज्यादा गिरा है और दो साल में तो गिरावट 16 फीसदी के करीब रही है।
सुब्रमण्यन ने कहा, ‘एचएनआई और फैमिली ऑफिसों के बीच संपत्तियां डॉलर में करने की मांग साफ नजर आ रही है। देसी शेयरों और एफडी के बजाय अब विदेश में निवेश की ही बात होती हैं। लेकिन बातचीत शेयरों की ही होती है। वैश्विक सूचकांकों, यूरोप के मिडकैप और अमेरिकी प्रौद्योगिकी फंडों पर चलने वाले विदेशी इक्विटी फंड इसे भांप चुके हैं। विदेशी इक्विटी में दम तो है मगर इसी पर अटक जाने से डॉलर वाली फिक्स्ड इनकम का फायदेमंद मौका गंवाया जा रहा है।’
भीतरी सूत्र बता रहे हैं कि भारतीय कारोबारी परिवारों को बच्चों की विदेश में शिक्षा, विदेशी संपत्ति की खरीद और कारोबर के वैश्विक विस्तार पर लगातार डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। ऐसे में अब कमाई कराने वाले डॉलर पोर्टफोलियो बनाने की बात चलने लगी है, जिसमें देनदारी के बराबर संपत्तियां भी हों।
ऑरटस कंसल्टिंग एलएलपी के सह-संस्थापक और पार्टनर जील जंबूवाला ने कहा, ‘डॉलर की कीमत में ठीकठाक गिरावट आने के बाद भारतीय कारोबारी परिवार डॉलर परिसंपत्तियों में निवेश पसंद कर रहे हैं। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि डॉलर परिसंपत्तियां रखनी हैं या नहीं, सवाल यह है कि कितनी और किस तरह रखनी हैं।’
चार्टर्ड अकाउंटिंग फर्म दीवान पीएन चोपड़ा ऐंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर ध्रुव चोपड़ा के अनुसार फिलहाल निवेश के लिए सबसे दमदार मांग आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, टेक्नॉलजी इन्फ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड कंप्यूटिंग और स्वास्थ्य सेवा नवाचार जैसे क्षेत्रों में ही है। उन्होंने कहा, ‘पिछले एक साल में प्रौद्योगिकी केंद्रित वैश्विक फंडों ने शानदार प्रदर्शन किया है। मसलन नवाचार-केंद्रित कुछ वैश्विक रणनीतियों ने पिछले 12 महीनों में 38 से 52 फीसदी रिटर्न दिया है जबकि सेमीकंडक्टर वाले थीम को भी एआई के कारण हो रहे निवेश से फायदा हुआ है।’
निवेश सलाहकारों का कहना है कि विदेश में निवेश से जुड़ी चर्चा में सबसे आसान एलआरएस है, जिसके तहत निवासी भारतीय विदेश में निवेश के लिए 2.5 लाख डॉलर सालाना तक भेज सकता है। दूर की सोचने वाले फैमिली ऑफिस इसे निवेश का प्राथमिक साधन मान रहे हैं और वित्त वर्ष की शुरुआत में ही पूंजी लगा दे रहे हैं।
बड़े निवेश के लिए गिफ्ट सिटी पर दांव खेला जा रहा है। विदेशी निवेश व्यवस्था के तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का रास्ता समझे जाने वाले गिफ्ट आईएफएससी फंड में परिवार निवेश कर सकते हैं। वे 50 फीसदी तक नेटवर्थ को रिजर्व बैंक से पूछे बगैर ही लगा सकते हैं।
गिफ्ट आईएफएससी में श्रेणी-3 वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) के जरिये कम खर्च में वैश्विक इक्विटी तथा डॉलर में आय वाले साधन मिल जाते हैं।
जंबूवाला ने कहा, ‘इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा फैमिली ऑफिस विदेशी निवेश ढांचे के तहत विदेश में फैमिली ऑफिस खड़े करने के लिए रिजर्व बैंक से मंजूरी मांग रहे हैं। परिवार विदेश में निवेश के लिए दीर्घकालिक और पूर्ण अनुपालन वाला ढांचा तलाश रहे हैं। यह सब देखकर कहा जा सकता है कि रुपये में अधिक संपत्ति को ये फैमिली ऑफिस कारगर नहीं मान रहे हैं और अलग-अलग मुद्रा में निवेश को सही माना जा रहा है।’
चोपड़ा ने कहा कि अब फैमिली ऑफिस 10 से 25 फीसदी वित्तीय परिसंपत्तियों को विदेश में लगाना पसंद कर रहे हैं, जिसमें थीम वाले शेयरों में निवेश, फिक्स्ड इनकम में निवेश तथा वैकल्पिक रणनीति शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘अलग-अलग मुद्रा में निवेश ही मकसद नहीं है बल्कि लंबे अरसे की वैश्विक वृद्धि में भागीदार बनना है तथा पोर्टफोलियो को हर उठापटक से निपटने लायक बनाना है।’
सुब्रमण्यन ने कहा कि विदेशी इक्विटी की ओर बाजार की दीवानगी के कारण डॉलर में स्थिर आय पर शायद किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।