Silver Funds: पिछले एक साल में 121.6 फीसदी का शानदार रिटर्न देने के बाद सिल्वर फंड्स की रफ्तार अब धीमी पड़ती दिख रही है। पिछले एक महीने में इनमें 14.1 फीसदी की गिरावट आई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इतनी तेज बढ़त के बाद निवेशकों को अपने रिटर्न की उम्मीदों को फिर से तय करने की जरूरत है। अब चांदी में अगले छह से 12 महीनों के दौरान कंसोलिडेशन (सुधार) देखने को मिल सकती है और सामान्य (नॉर्मलाइज्ड) रिटर्न मिलने की संभावना है।
हालिया गिरावट 2025 में आई तेजी के बाद बाजार की गति धीमी होने का संकेत देती है। वालट्रस्ट के डायरेक्टर और को-फाउंडर राहुल भुटोरिया कहते हैं, “मैक्रो इकोनॉमिक स्थिति प्रतिकूल होने के बाद मोमेंटम-आधारित निवेश तेजी से बाहर निकल गया।”
एक्सिस सिक्योरिटीज के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटीज) देवेया गगलानी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत 120 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस तक पहुंचने के बाद निवेशकों ने मुनाफा कमाया।
एक और बड़ा कारण ईरान युद्ध का शुरू होना रहा। कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने से महंगाई की चिंताएं बढ़ गईं। गगलानी कहती हैं, “जहां पहले बाजार ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहा था, वहीं अब संभावित दर बढ़ोतरी की आशंका बनने लगी है।”
सेफ-हेवन निवेश बढ़ने से अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए डॉलर के मजबूत होने का उस पर दबाव पड़ता है। बॉन्ड यील्ड भी बढ़ी हैं, जिससे डेट प्रोडक्ट ज्यादा आकर्षक हो गए हैं।
कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतें वैश्विक आर्थिक वृद्धि को धीमा कर सकती हैं, जिससे चांदी की औद्योगिक मांग कमजोर पड़ सकती है। द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर प्रसन्ना पाठक कहते हैं, “सोलर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे औद्योगिक सेक्टरों से शॉर्ट-टर्म मांग में समायोजन (रीकैलिब्रेशन) भी इस गिरावट का कारण बना।”
वैश्विक स्तर पर कीमतों में गिरावट के साथ एक्सचेंजों ने मार्जिन बढ़ा दिए। मार्जिन कॉल और फोर्स्ड लिक्विडेशन (जब निवेशकों को मजबूरी में अपनी पोजीशन बेचनी पड़ती है) ने चांदी की गिरावट को और तेज कर दिया। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के कमोडिटी विश्लेषक मानव मोदी कहते हैं, “चांदी के एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) में बिकवाली और एनर्जी सेक्टर की ओर लिक्विडिटी में बदलाव ने इसकी कीमत पर दबाव डाला।”
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि मध्यम अवधि में चांदी के लिए स्ट्रक्चरल रूप से तेजी का मामला अभी भी मजबूत बना हुआ है। क्लाइमेट-फ्रेंडली टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ता रुझान, चांदी की मांग को सपोर्ट करता रहेगा। निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के कमोडिटीज हेड और फंड मैनेजर विक्रम धवन कहते हैं, “ग्रीनटेक, रिन्यूएबल्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और इलेक्ट्रॉनिक्स से मांग लगातार बढ़ रही है।”
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग से भी मांग बढ़ने की उम्मीद है। जहां उभरती तकनीकें मांग को सहारा देती रहेंगी, वहीं सप्लाई सीमित बनी हुई है। भुटोरिया के अनुसार, “फिजिकल सप्लाई में चांदी लगातार छठे साल घाटे (डिफिसिट) में एंट्री कर रही है।” खनन आपूर्ति तेजी से नहीं बढ़ सकती, क्योंकि ज्यादातर चांदी अन्य धातुओं के साथ उप-उत्पाद (by-product) के रूप में निकलती है।
गोल्ड-सिल्वर रेशियो भी फिर से ऐसे स्तर पर आ गया है, जो ऐतिहासिक रूप से निवेश के लिहाज से आकर्षक माना जाता रहा है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब चांदी की वैल्यूएशन काफी हद तक उचित (फेयरली वैल्यूड) हो चुकी है। गगलानी के अनुसार, “यह अपने $120 के शिखर से लगभग 50 फीसदी तक गिर चुकी है, इसलिए इसमें आगे बड़ी गिरावट की संभावना कम है।”
साथ ही, हालिया तेजी की गति भी आगे कायम रहना मुश्किल है। धवन कहते हैं, “आगे की बढ़त ज्यादा संतुलित और टिकाऊ रहने की संभावना है, न कि बहुत तेज।”
अगले छह से 12 महीनों में उतार-चढ़ाव और कंसोलिडेशन के चरण देखने को मिल सकते हैं। भुटोरिया के अनुसार, “अगले दो क्वार्टर में चांदी $60–80 के दायरे में कंसोलिडेट कर सकती है।”
वे आगे कहते हैं कि $55 से नीचे लगातार गिरावट तभी संभव है, जब मौजूदा संघर्ष लंबे समय तक जारी रहे और इससे आर्थिक गतिविधियों पर गहरा असर पड़े।
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि $100 के ऊपर स्थायी बढ़त हासिल करने में अभी समय लग सकता है। भुटोरिया के अनुसार, “अगर डॉलर और ब्याज दरें अनुकूल रुख अपनाती हैं, तो साल की दूसरी छमाही में ऊपर की ओर री-रेटिंग संभव है।”
मौद्रिक नीति में ढील और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में कटौती से कीमती धातुओं को सहारा मिलेगा। ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में सुधार भी औद्योगिक मांग को बनाए रखने में मदद करेगा। हालांकि इसके लिए सोलर, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और हाई-टेक सेक्टर के इंडस्ट्रियल यूजर्स को बढ़ती लागत को वहन करने और आगे पास करने में सक्षम होना होगा।
मोदी के अनुसार, “सेफ-हेवन डिमांड में बढ़ोतरी और ETF में फिर से निवेश (इनफ्लो) आने से तेजी का दौर दोबारा शुरू हो सकता है।”
पिछली तेजी री-रेटिंग और लिक्विडिटी के कारण आई थी। पाठक के अनुसार, “अगला चरण ज्यादा हद तक वास्तविक मांग की स्थिति, मैक्रो स्थिरता और लगातार निवेश पर निर्भर करेगा।”
निवेशकों को चांदी को शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग के बजाय अपनी लॉन्ग-टर्म एसेट एलोकेशन का हिस्सा मानना चाहिए। यह पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन लाने और महंगाई के खिलाफ सुरक्षा (हेज) देने में मदद कर सकती है।
अगर हालिया तेजी के कारण पोर्टफोलियो में चांदी का वजन ज्यादा (ओवरवेट) हो गया है, तो कुछ हद तक मुनाफावसूली कर रीबैलेंस करना चाहिए। मोदी के अनुसार, “लॉन्ग-टर्म निवेशकों को गिरावट के दौरान निचले स्तरों को खरीदारी के अवसर के रूप में देखना चाहिए।”
साथ ही, मौजूदा कीमतों पर आक्रामक खरीदारी से बचना चाहिए। नई निवेश राशि को एकमुश्त (लंपसम) लगाने के बजाय चरणबद्ध (स्टैगर्ड) तरीके से निवेश करना बेहतर रहेगा।
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जो नए निवेशक पिछले एक साल की तेजी से चूक गए, वे इस गिरावट का उपयोग चांदी में एंट्री के लिए कर सकते हैं, क्योंकि मौजूदा कीमतें तीन महीने पहले की तुलना में ज्यादा उचित (रीजनेबल) हैं।
निवेश की शुरुआत सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए करनी चाहिए, ताकि खरीद की लागत औसत हो सके और उतार-चढ़ाव का असर कम हो। एकमुश्त (लंपसम) निवेश से बचना बेहतर रहेगा।
चांदी को एक हाई-वोलेटिलिटी (ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली) कमोडिटी के रूप में देखना चाहिए, जिसके लिए लंबी अवधि का नजरिया जरूरी है। लीवरेज (उधार लेकर निवेश) से बचना चाहिए। निवेश अवधि कम से कम पांच साल की होनी चाहिए और निवेशकों को बीच-बीच में आने वाले उतार-चढ़ाव और गिरावट (ड्रॉडाउन) के लिए तैयार रहना चाहिए।
प्रेशियस मेटल्स में कुल निवेश आमतौर पर पोर्टफोलियो का 15-20 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। धवन के अनुसार, “गोल्ड और सिल्वर के बीच 70:30 या 80:20 का रेशियो रिटर्न और रिस्क के बीच बेहतर संतुलन बना सकता है।”
प्रसन्न पाठक के अनुसार, कंजर्वेटिव (संरक्षित) निवेशकों को चांदी में 5–7 प्रतिशत, मॉडरेट (मध्यम) निवेशकों को 7–10 प्रतिशत और एग्रेसिव (आक्रामक) निवेशकों को 10–15 प्रतिशत तक निवेश करना चाहिए।
पाठक का सुझाव है कि कंजर्वेटिव निवेशकों को चांदी में 5-7 फीसदी, मॉडरेट निवेशकों को 7-10 फीसदी और एग्रेसिव निवेशकों को 10-15 फीसदी तक निवेश करना चाहिए।