अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ला दी है। पिछले 15 दिनों में डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 73 डॉलर से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर के पार कारोबार कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़े तनाव के बाद बाजार को तेल सप्लाई प्रभावित होने का डर है, जिससे कीमतों में फिर तेजी का माहौल बन गया है।
विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल बाजार भू राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक मांग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव बना रह सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का करीब 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा सीधे तेल की सप्लाई पर असर डाल सकती है।
ईरान की नई कार्रवाई और अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद बाजार को आशंका है कि तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि कच्चे तेल में फिर से जोखिम प्रीमियम जुड़ गया है।
इस साल तेल बाजार में बड़ी तेजी और गिरावट दोनों देखने को मिली हैं। फरवरी से अप्रैल के बीच युद्ध के दौरान ब्रेंट करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। 17 जून को युद्धविराम के बाद यह करीब 70 डॉलर तक फिसल गया। लेकिन 12 जुलाई को होर्मुज को लेकर तनाव बढ़ने के बाद कीमतें फिर तेजी से बढ़ीं और ब्रेंट 85 डॉलर के ऊपर निकल गया।
बाजार में केवल युद्ध का असर नहीं है। कई दूसरे कारक भी कीमतों को समर्थन दे रहे हैं।
मिराए एसेट शेयर खान के रिसर्च एनालिस्ट मोहम्मद इमरान के मुताबिक, अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार कई दशक के निचले स्तर पर है। वहीं यूरोप में डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। रूस के रिफाइनिंग ढांचे पर यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों से उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके अलावा रूस ने जुलाई में डीजल निर्यात पर रोक लगा दी है, जिससे वैश्विक बाजार में रिफाइंड ईंधन की उपलब्धता और घट गई है।
एनालिस्ट के अनुसार सबसे ज्यादा दबाव कच्चे तेल में नहीं बल्कि डीजल जैसे तैयार ईंधन में दिखाई दे रहा है। रूस से सप्लाई घटने और पश्चिम एशिया के कुछ रिफाइनरियों में उत्पादन प्रभावित होने से यूरोप में डीजल की कमी बढ़ गई है। अमेरिका की रिफाइनरियां ऊंची क्षमता पर काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें घरेलू बाजार के साथ साथ यूरोप की मांग भी पूरी करनी पड़ रही है। ऐसे में डीजल और दूसरे रिफाइंड उत्पादों की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।
इस बीच ओपेक प्लस देशों ने भी उत्पादन बढ़ाना जारी रखा है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, इराक और कतर एशियाई ग्राहकों को अधिक छूट देकर बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब केवल उत्पादन कटौती के जरिए कीमतों को नियंत्रित करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
लंबी अवधि में तेल की मांग पर इलेक्ट्रिक वाहनों का असर भी दिखाई देने लगा है। भारत समेत कई एशियाई देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। इससे पेट्रोल और डीजल की मांग की रफ्तार धीरे धीरे कम हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सप्लाई से जुड़े जोखिम इतने बड़े हैं कि उनका असर मांग में आई इस धीमी कमी से ज्यादा रहेगा।
एक्सपर्ट का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतें अमेरिका और ईरान से जुड़ी हर नई खबर पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती हैं। यदि तनाव कम होता है तो कीमतों में राहत मिल सकती है, लेकिन अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति और बिगड़ती है तो फिर से तेजी देखने को मिल सकती है।
मोहम्मद इमरान के अनुसार अगले तीन से छह महीनों में ब्रेंट क्रूड 74 से 95 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकता है, जबकि डब्ल्यूटीआई आमतौर पर ब्रेंट से 4 से 6 डॉलर प्रति बैरल नीचे कारोबार कर सकता है। उनका मानना है कि डीजल की वैश्विक कमी और रिफाइंड ईंधन की तंगी अगले कुछ महीनों तक बनी रह सकती है, जिससे तेल बाजार में अस्थिरता जारी रहने की संभावना है।