गिल्ट और डायनैमिक बॉन्ड फंड डेट फंडों की ऐसी दो श्रेणियां हैं जिनमें ड्यूरेशन (अवधि) को लेकर सबसे ज्यादा लचीलापन होता है। लेकिन ये श्रेणियां हाल के महीनों में बिल्कुल अलग-अलग रुख अपना रही हैं। कुछ फंड प्रबंधक रक्षात्मक बने हुए हैं तो दूसरे ब्याज दरें बढ़ने के जोखिम के बावजूद ड्यूरेशन को लेकर आक्रामक दांव लगा रहे हैं।
गिल्ट-फंड पोर्टफोलियो से इस अंतर का स्पष्ट पता चलता है। बड़ी योजनाओं में बंधन गिल्ट फंड का रुख सबसे आक्रामक है। मई में उसकी औसत परिपक्वता 32.2 साल थी। इसके बाद आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल गिल्ट फंड (21.6 साल), निप्पॉन इंडिया गिल्ट फंड (21.3 साल) और एचडीएफसी गिल्ट फंड (21.2 साल) का नंबर आता है।
दूसरी ओर, एसबीआई गिल्ट फंड ने 10.1 साल की औसत परिपक्वता के साथ अपेक्षाकृत सुरक्षित रुख बनाए रखा, जबकि कोटक गिल्ट फंड की औसत परिपक्वता 13.1 साल रही।
डायनैमिक बॉन्ड श्रेणी में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। बंधन डायनैमिक बॉन्ड फंड ने अपनी औसत परिपक्वता को साल की शुरुआत में दो साल से कुछ अधिक से बढ़ाकर मई में तेजी से 21.3 साल कर दिया।
एचडीएफसी डायनैमिक बॉन्ड फंड का निवेश भी लंबी अवधि पर केंद्रित रहा। उसकी औसत परिपक्वता 19.7 साल थी। इसके उलट निप्पॉन इंडिया डायनैमिक बॉन्ड फंड ने 4.1 साल की काफी कम परिपक्वता वाला पोर्टफोलियो बनाए रखा, जबकि एसबीआई डायनैमिक बॉन्ड फंड ने 5.4 साल के साथ अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाया।
भले ही ड्यूरेशन के मामले में निवेश का तरीका अलग-अलग था, लेकिन मई में ज्यादातर बड़ी योजनाएं एक ही दिशा में आगे बढ़ीं। उन्होंने आरबीआई की पॉलिसी समीक्षा और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर टैक्स में बदलाव से पहले अपने पोर्टफोलियो की परिपक्वता अवधि बढ़ाई।
मई में छह बड़े गिल्ट फंडों की औसत परिपक्वता अप्रैल के 17.3 साल से बढ़कर 19.9 साल हो गई, जबकि छह में से चार योजनाओं ने इस महीने के दौरान पोर्टफोलियो परिपक्वता बढ़ाई। छह बड़े डायनैमिक बॉन्ड फंडों में औसत परिपक्वता 10.8 साल से बढ़कर 12.8 साल हो गई जबकि पांच योजनाओं ने समयावधि बढ़ाई।
5 जून को आरबीआई और सरकार की ओर से घोषित उपायों तथा अमेरिका-ईरान के बीच बनी सहमति से लंबी अवधि वाले बॉन्डों के सामने आ रही कुछ मुश्किलों में कमी आई है। पिछले दो सप्ताह में बॉन्ड यील्ड में नरमी आई है और इसका सबसे ज्यादा फायदा लंबी अवधि वाली प्रतिभूतियों को हुआ है।
एचडीएफसी एमएफ ने जून की अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘पूंजी प्रवाह आकर्षित करने के लिए आरबीआई के कदमों से मुद्रा पर दबाव कम होना चाहिए और इन उपायों से एक ही बार में कई चिंताओं का समाधान होना चाहिए। इनसे पूंजी प्रवाह बेहतर होगा, मुद्रा में स्थिरता आएगी, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा, सिस्टम में तरलता बढ़ेगी, बैंकों के लिए क्रेडिट- डिपॉजिट रेश्यो संतुलित होगा और मनी मार्केट तथा कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड में कमी आएगी।’