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अमेरिका-ईरान युद्ध विराम पर टिकी बाजार की उम्मीदें, लंबा संकट बढ़ा सकता है जोखिम: निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड

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निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के इक्विटी निवेश के अध्यक्ष और मुख्य निवेश अधिकारी शैलेश राज भान ने कहा कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो वे आय वृद्धि में बाधा डालेंगी।

Last Updated- April 01, 2026 | 9:08 AM IST

निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के इक्विटी निवेश के अध्यक्ष और मुख्य निवेश अधिकारी शैलेश राज भान ने कहा कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो वे आय वृद्धि में बाधा डालेंगी। इस कारण बाजारों के लिए यह अहम होगा कि पश्चिम एशिया का संकट कब तक चलता है। अभिषेक कुमार के साथ ईमेल बातचीत में उन्होंने कहा कि बिकवाली ने निवेशकों के लिए खरीदारी के अवसर पैदा किए हैं, बशर्ते उनके पास तीन से पांच साल का नजरिया और वे धीरे-धीरे निवेश करने की राह अपनाएं। बातचीत के अंश:

आप इस समय घरेलू बाजार को किस तरह देखते हैं? क्या आपको लगता है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़े जोखिम का पूरा असर दिख चुका है?

भारतीय शेयर बाजारों में लगभग दो साल से गिरावट चल रही है। निफ्टी का मूल्यांकन सितंबर 2024 के ऊंचे स्तरों से 10-15 प्रतिशत नीचे आ गया है। मिड और स्मॉलकैप शेयरों में यह गिरावट ज्यादा रही है, खासकर टैरिफ और अमेरिका-ईरान संघर्ष की वजह से। जिन कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 10,000 करोड़ रुपये से कम है, उनके शेयरों में बड़ी गिरावट आई है। संकट कब तक चलता है, इसी से बाजार का व्यवहार मुख्य रूप से तय होगा। ऊर्जा की ऊंची कीमतें घरेलू और वैश्विक, दोनों तरह की ग्रोथ पर असर डालती हैं और संकट लंबा चलने से कंपनियों की आय पर काफी असर पड़ सकता है।
ऐसा लगता है कि बाजार मानकर चल रहे हैं कि संकट जल्द हल हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसका बुरा असर कंपनियों की कमाई और बाजार, दोनों पर पड़ सकता है। इसलिए भू-राजनीतिक अनिश्चितता को देखते हुए, सही परिसंपत्ति आवंटन के अलावा व्यवस्थित नजरिया अपनाना बहुत जरूरी है।

जब से जंग छिड़ी है, आपने अपने पोर्टफोलियो में क्या बदलाव किए हैं? क्या आपके पास ज्यादा नकदी है?

पिछले दो साल में हमने अपनी लार्जकैप होल्डिंग्स बढ़ाई हैं, जिससे हमारा पोर्टफोलियो बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिहाज से ज्यादा मजबूत हो गया है। हमने मूल्यांकन पर कड़ी नजर रखी है जिससे कि वृद्धि के लिए ज्यादा कीमत न चुकाएं। इससे जोखिम कम करने में मदद मिली है। बाजार में उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए निजी क्षेत्र के वित्तीय, फार्मास्युटिकल, चुनिंदा सूचना प्रौद्योगिकी सेवा और यूटिलिटीज जैसे क्षेत्रों का सापेक्ष आकर्षण जोखिम-समायोजित आधार पर बेहतर हुआ है। हमारा ध्यान इन सेक्टरों में निवेश बढ़ाने पर रहा है।

इस समय तेल की बढ़ी हुई कीमतें कितनी बड़ी चिंता हैं? किन क्षेत्रों पर इसका ज्यादा असर पड़ने की संभावना है?

अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो यह बड़ी चिंता की बात है। अगर कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका स्थानीय और वैश्विक, दोनों ही स्तरों पर विकास की संभावनाओं पर गहरा असर पड़ सकता है।

अभी पूंजी की आवक को लेकर कितनी चिंता है, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की बिकवाली जारी है और घरेलू निवेश में कुछ नरमी के संकेत दिख रहे हैं?

हाल के सप्ताहों में एफपीआई की बिकवाली तेज हुई है, क्योंकि अमेरिका-ईरान लड़ाई की वजह से जोखिम लेने की इच्छा घटी है। लेकिन घरेलू निवेश स्थिर बना हुआ है, खासकर म्युचुअल फंडों में सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआई) के जरिये आने वाला निवेश। अभी चल रही बिकवाली उन निवेशकों के लिए अवसर है, जिनका नजरिया तीन से पांच साल है।

इस महीने वित्तीय शेयरों में भारी गिरावट आई है। क्या यह गिरावट जरूरत से ज्यादा बढ़ गई?

ऐतिहासिक रूप से, वित्तीय क्षेत्र में एफपीआई की हिस्सेदारी ज्यादा रही है। इसलिए उनकी किसी भी बिकवाली से इस क्षेत्र पर दबाव पड़ता है। इसके अलावा, लंबे समय तक चलने वाले एनर्जी संकट से पैदा होने वाले महंगाई का जोखिम भी चिंता का सबब बना हुआ है।

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First Published - April 1, 2026 | 9:08 AM IST

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