ऐसे समय में जब वैश्विक बाजारों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें विदेशी केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में अनुमान से ज्यादा वृद्घि, रूस और यूक्रेन के बीच मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव, और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी मुख्य रूप से शामिल है, विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय बाजारों में अभी भी तेल में तेजी और मुद्रास्फीति पर उसके प्रभाव का असर पूरी तरह से नहीं देखा गया है, क्योंकि सरकार ने वाहन तेल कीमतों को मौजूदा राज्य चुनावों को देखते हुए अपरिवर्तित रखा।
इक्विनोमिक्स रिसर्च ऐंड एडवायजरी के मुख्य निवेश अधिकारी एवं संस्थापक चोकालिंगम जी ने कहा, ‘बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का पूरा असर नहीं दिखा है। 100 डॉलर प्रति बैरल की तेजी का नकारात्मक असर पड़ेगा और इससे गिरावट को बढ़ावा मिल सकता है। यह अर्थव्यवस्था और वित्तीय गणित के लिए खराब खबरें होंगी। इससे भारतीय उद्योग जगत, खासकर कच्चे तेल एवं सह-उत्पाद का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों की वित्त वर्ष 2023 की आय भी प्रभावित होगी।’
पिछले एक महीने में सेंसेक्स और निफ्टी-50 में 6 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है। दूसरी तरफ कच्चा तेल 96 डॉलर प्रति डॉलर के साथ आठ साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया, जो करीब 12 प्रतिशत तक की तेजी है।
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक एवं निदेशक यू आर भट का कहना है, ‘मौजूदा स्तरों पर, बाजार में मुद्रास्फीति में तेजी की संभावना का असर नहीं दिख रहा है और इसमें जमीनी स्तर पर हो रहे बदलावों के बजाय आरबीआई के अनुमानों का असर देखा जा रहा है।’
नोमुरा के विश्लेषकों का मानना है कि ऊंची जिंस कीमत, ईंधन कीमतों में तेजी (राज्य चुनावों के बाद संभवत: मार्च से), सेवाओं के फिर से खुलने से दबाव, और ऊंची घरेलू मुद्रास्फीति उम्मीदें मुद्रास्फीति के लिए तेजी के जोखिम हैं। इन विश्लेषकों ने मुख्य मुद्रास्फीति वित्त वर्ष 2023 में 5.8 औसत प्रतिशत रहने का अनुमान जताया, जो आरबीआई के 4.5 प्रतिशत के अनुमान से ऊपर है।
आंकड़ों से पता चलता है कि भारत की रिटेल मुद्रास्फीति जनवरी में 6.01 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि थोक कीमत मुद्रास्फीति दर 12.96 प्रतिशत पर लगातार 10वें महीने दो अंक में बनी रही, जो पूर्ववर्ती महीने में दर्ज 13.56 प्रतिशत से कुछ कम है।
यूबीएस सिक्योरिटीज में अर्थशास्त्री तन्वी गुप्ता जैन का कहना है, ‘उपभोक्ता कीमत सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति काफी हद तक विपरीत आधार प्रभाव और निरंतर आपूर्ति संबंधित समस्याओं पर केंद्रित थी। जिंस कीमतों, खासकर तेल में तेजी, आपूर्ति संबंधित दिक्कतों, के अलावा उत्पादन लागत आधारित दबाव से मुद्रास्फीति आगामी महीनों के दौरान ऊंची बनी रहेगी। हमारा मानना है कि सीपीआई मुद्रास्फीति अप्रैल तक 5.5-6 प्रतिशत के दायरे में ऊंची बनी रहेगी और फिर ये जून तिमाही से नरम पड़कर 5 प्रतिशत के आसपास रहेगी।’
इन घटनाक्रम को देखते हुए बोफा सिक्योरिटीज के विश्लेषकों ने दिसंबर 2022 के निफ्टी लक्ष्य को शुरू के 19,100 से घटाकर 17,00 कर दिया है।
बोफा सिक्योरिटीज में भारतीय शोध के प्रमुख अमीष शाह ने एक ताजा रिपोर्ट में लिखा है, ‘हमारे अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को अब फेडरल द्वारा कैलेंडर वर्ष 2022/2023 में 100/175 आधार अंक की वृद्घि के साथ तेज दर वृद्घि चक्र का अनुमान है। वर्ष 1994 से फेडरल/आरबीआई दर वृद्घि चक्र से पता चलता है कि बाजार मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है। भारत निवेश के लिहाज से उपयुक्त स्थान है और उसे वृद्घि-केंद्रित वित्तीय/मौद्रिक नीतियों से समर्थन हासिल है।’