ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष शुरू होने के बाद से ही दुनिया भर के फाइनेंशियल मार्केट्स सही दिशा नहीं ढूंढ पा रहे हैं। ज्यादातर शेयर बाजार लाल निशान पर बने हुए हैं। कभी-कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप जब शांतिपूर्ण हल की बात करते हैं तो थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन संकेत बदलते ही बाजार फिर गिर जाते हैं।
इस अस्थिरता का असर हर तरह के एसेट्स पर पड़ रहा है। आमतौर पर संकट के समय सोना और चांदी जैसे सुरक्षित ठिकाने माने जाते हैं, लेकिन इस बार वो भी गिर रहे हैं। वहीं बॉन्ड यील्ड्स बढ़ रहे हैं, शेयरों पर दबाव है, लेकिन क्रिप्टोकरेंसी थोड़ी मजबूत बनी हुई हैं।
आम तौर पर जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो लोग सबसे पहले सोने की तरफ भागते हैं, लेकिन इस बार कहानी उलटी चल रही है। सोमवार 23 मार्च को सोने की कीमत 8% से ज्यादा गिर गई। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक यह चार महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। पिछले हफ्ते तो करीब 43 साल की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट भी देखी गई। स्पॉट मार्केट में सोना 6.3% गिरकर 4,203.21 डॉलर प्रति औंस पर आ गया।
पूरे हफ्ते में 10% से ज्यादा की गिरावट आई, जो फरवरी 1983 के बाद सबसे तेज है। अगर जनवरी के करीब 5,594 डॉलर वाले पीक से देखें, तो सोना अब 20% से ज्यादा टूट चुका है।
MarketWatch के मुताबिक इसकी बड़ी वजह है अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड और मजबूत होता डॉलर। आसान शब्दों में, जब दूसरी जगह ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है, तो लोग सोने से पैसा निकालने लगते हैं और इसी से इसकी कीमत गिरती है।
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चांदी भी ज्यादातर समय सोने के साथ ही कदम से कदम मिलाकर चल रही है, लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव ज्यादा तेज है। महीने की शुरुआत में इसकी कीमत 88–90 डॉलर प्रति औंस के आसपास थी, लेकिन अब इसमें तेज गिरावट देखने को मिल रही है। हालिया बिकवाली में एक ही दिन में 8–9% तक गिर गई। सोमवार को स्पॉट सिल्वर 6.1% गिरकर 63.66 डॉलर प्रति औंस पर आ गया।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक चांदी में ज्यादा हलचल इसलिए दिखती है क्योंकि इसका रोल डबल है। चांदी निवेश के लिए भी है और इंडस्ट्री में भी इस्तेमाल होती है। लेकिन अभी इसकी चाल भी सोने जैसी ही है। जंग का असर कम दिख रहा है, जबकि हाई यील्ड्स और पिछले साल की तेजी के बाद मुनाफावसूली ज्यादा असर डाल रही है।
इस बार सरकारी बॉन्ड भी वैसे सेफ नहीं दिख रहे जैसे आम तौर पर होते हैं। 23 मार्च को अमेरिका के 10 साल के ट्रेजरी यील्ड करीब 4.415% तक पहुंच गए, जो पिछले 8 महीनों का हाई है। ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से ये करीब 44 बेसिस पॉइंट बढ़ चुके हैं।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, जब यील्ड बढ़ती है तो इसका मतलब होता है कि बॉन्ड की कीमतें गिर रही हैं, जिसका मतलब लोग बॉन्ड बेच रहे हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह महंगाई का बढ़ता डर है। जंग शुरू होते ही ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। तेल महंगा होता है तो सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। ऐसे में बाजार मान रहा है कि फेड अभी ब्याज दरें घटाने के मूड में नहीं है, बल्कि सख्ती जारी रख सकता है। और इसी कारण यील्ड्स बढ़ रही हैं।
शेयर बाजारों की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं है, क्योंकी ज्यादातर जगह गिरावट ही दिख रही है, बस अलग-अलग देशों में इसकी तेजी अलग-अलग है।
एशिया में जापान का निक्केई करीब 3.5% नीचे है, साउथ कोरिया 5.8% गिरा है और चीन का CSI300 इंडेक्स 2.4% नीचे है। अमेरिका में S&P 500 साल की शुरुआत से करीब 5% गिर चुका है, जबकि नैस्डैक में करीब 6.9% की गिरावट है। यूरोप में भी दबाव बना हुआ है। FTSE 100 अपने हालिया हाई से 10% से ज्यादा नीचे आकर करेक्शन जोन में पहुंच गया है। भारत की बात करें तो यहां के बड़े इंडेक्स भी जंग बढ़ने के बाद से 10% से ज्यादा गिर चुके हैं।
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क्रिप्टोकरेंसी इस बार शेयर बाजारों के साथ कदम से कदम नहीं मिला रही। आंकड़े बताते हैं कि इस महीने बिटकॉइन करीब 8% ऊपर है, जबकि स्टॉक मार्केट कमजोर दिख रहे हैं। मार्च की शुरुआत में यह करीब 71,000 डॉलर तक पहुंच गया था, जहां इसे निवेशकों के इनफ्लो और पोजीशनिंग से सपोर्ट मिला।
सोमवार को बिटकॉइन करीब 68,500 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था। यानी अपने मार्च वाले पीक से थोड़ा नीचे है, लेकिन जंग शुरू होने से पहले के मुकाबले अभी भी बढ़त में है। (हालांकि उससे पहले यह अपने ऑल-टाइम हाई से 50% से ज्यादा गिर चुका था।)
इससे साफ है कि क्रिप्टो का मामला थोड़ा अलग है। यह न तो पूरी तरह सोने जैसा सेफ ठिकाना बन रहा है, और न ही शेयर बाजार की तरह पूरा रिस्क एसेट। इसकी चाल ज्यादा इस बात पर निर्भर कर रही है कि मार्केट में लिक्विडिटी कितनी है और निवेशकों का पैसा किस दिशा में जा रहा है, जो अभी अनिश्चितता के बावजूद सपोर्ट दे रहा है।