विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) लगातार सातवें महीने भारतीय शेयर बाजार में शुद्घ बिकवाल रहे। 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से विदेशी निवेशकों द्वारा इतने लंबे समय तक लगातार बिकवाली नहीं देखी गई थी।
दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के सतर्क रुख, रूस-यूक्रेन युद्घ, जिंसों के चढ़ते दाम और शेयरों का मूल्यांकन ज्यादा होने जैसे जोखिम देखकर विदेशी निवेशक शेयर बाजार से अपना निवेश लगातार निकाल रहे हैं।
अक्टूबर 2021 से अभी तक विदेशी निवेशकों ने भारत के शेयर बाजार से रिकॉर्ड 22 अरब डॉलर (1.7 लाख करोड़ रुपये) की निकासी की है। वर्ष 2008 में एफपीआई ने मई से नवंबर 2008 के बीच लगातार सात महीने बिकवाली की थी। उस दौरान विदेशी निवेशकों ने 10 अरब डॉलर की निकासी की थी। इसकी वजह से बेंचमार्क सेंसेक्स 50 फीसदी तक टूट गया था। लेकिन इस बार रिकॉर्ड बिकवाली के बावजूद सेंसेक्स अक्टूबर मध्य के उच्च स्तर से केवल 7.4 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा है। 2008 के उलट इस बार व्यक्तिगत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली की कुछ हद तक भरपाई की है, जिससे बाजार में ज्यादा गिरावट नहीं आई।
अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में तेजी आने की वजह से विदेशी निवेशक भारत सहित उभरते बाजारों से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं। लेकिन भारत में मार्च 2020 के बाद से बाजार में आई तेजी से शेयरों का प्रीमियम अन्य उभरते देशों की तुलना में ज्यादा बढ़ गया है। यही वजह है कि देसी बाजार से विदेशी निवेशक ज्यादा निकासी कर रहे हैं। अवेंडस कैपिटल स्ट्रैटजीज के मु य कार्याधिकारी एंड्रयू हॉलैंड ने कहा, ‘मूल्यांकन में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है और यह महंगा बना हुआ हैक्योंकि पिछले साल अन्य उभरते बाजारों में भारत जैसी तेजी नहीं आई थी।’ शेयर महंगे होने के अलावा केंद्रीय बैंकों के सतर्क रुख और मुद्रास्फीति को काबू में करने पर ध्यान देने से भी बाजार पर असर पड़ा है। हॉलैंड ने कहा कि वैश्विक बाजार में जब भी ब्याज दरों में इजाफा होता है तब जोखिम वाली संपत्तियों से पूंजी निकलना शुरू हो जाता है। यह उभरते बाजारों की मुद्राओं और बॉन्ड पर भी लागू होता है। यूरोप में भू-राजनीतिक संघर्ष और चीन में कोविड के बढ़ते मामलों के बीच डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड कई साल के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं।