Stock Market Outlook: सोमवार सुबह जब निवेशक रवि (काल्पनिक नाम) ने अपना पोर्टफोलियो देखा, तो स्क्रीन पर लाल रंग ही लाल दिख रहा था। न्यूज में लगातार एक ही खबर चल रही थी- खाड़ी में तनाव बढ़ गया है, तेल 100 डॉलर के पार जा सकता है। रवि के मन में सवाल था, ‘क्या बाजार और गिरेगा?’
दरअसल, यही डर इस समय पूरे बाजार में फैला हुआ है। ब्रोकरेज फर्म एमके की ताजा रिपोर्ट भी इसी चिंता को और गहरा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव जारी रहा और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास 3-4 महीने तक बना रहा, तो इसका असर सिर्फ बाजार ही नहीं, बल्कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं हैं। होर्मुज स्ट्रेट पर असर पड़ने से तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी हुई हैं।
बाजार को पहले उम्मीद थी कि हालात जल्दी सुधरेंगे, लेकिन अब यह उम्मीद भी कमजोर पड़ती दिख रही है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अचानक युद्धविराम हो जाता है, तो तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है और बाजार को राहत मिल सकती है।
भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा मुश्किल इसलिए है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर तेल महंगा बना रहता है, तो महंगाई बढ़ेगी, चालू खाता घाटा बढ़ेगा और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आएगा।
इसके साथ ही एलपीजी की सप्लाई पर भी असर पड़ा है। होर्मुज में रुकावट के कारण गैस की उपलब्धता प्रभावित हुई है। सरकार ने घरेलू सप्लाई बनाए रखने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन उद्योगों और थोक उपभोक्ताओं को अगले कुछ हफ्तों तक दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।
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अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहते हैं, तो असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहेगा। रिपोर्ट के मुताबिक रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और यह 95 प्रति डॉलर तक कमजोर हो सकता है। इसके साथ ही बॉन्ड यील्ड बढ़ने और विदेशी निवेश निकलने का भी खतरा है। फिलहाल आरबीआई के कदमों से स्थिति संभली हुई है, लेकिन लंबे समय तक यह दबाव टिके रहना मुश्किल हो सकता है।
यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। ऊंची महंगाई, कमजोर मांग और निवेश में कमी से वैश्विक ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। यहां तक कि युद्ध खत्म होने के बाद भी सप्लाई सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं।
एमके की रिपोर्ट के मुताबिक अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो निफ्टी में करीब 10 प्रतिशत तक और गिरावट आ सकती है और यह 21,000 के स्तर तक आ सकता है। इसका कारण साफ है- कंपनियों की लागत बढ़ेगी और मांग भी कमजोर पड़ेगी, जिससे कमाई पर दोहरा असर पड़ेगा।
ऐसे माहौल में कोई भी सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, लेकिन कुछ सेक्टरों पर असर ज्यादा पड़ सकता है। ऑयल कंपनियां, एयरलाइंस, ऑटो और यूटिलिटी सेक्टर ज्यादा दबाव में रह सकते हैं। वहीं टेक्नोलॉजी, फार्मा, मेटल और पावर जैसे सेक्टर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकते हैं, क्योंकि इन पर तेल की कीमतों का सीधा असर कम होता है।
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हालांकि बाजार में डर का माहौल है, लेकिन ब्रोकरेज का मानना है कि कुछ शेयरों में गिरावट जरूरत से ज्यादा हो चुकी है। एचडीएफसी बैंक, बजाज फिनसर्व, मैक्स हेल्थकेयर और एटर्नल जैसे शेयरों में निवेश के मौके बन सकते हैं, क्योंकि इनमें आगे सुधार की संभावना है।
रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश यही है कि यह गिरावट स्थायी नहीं है। जैसे ही तेल की कीमतें फिर से सामान्य स्तर यानी करीब 70 डॉलर के आसपास आती हैं, भारत की अर्थव्यवस्था और कंपनियों की कमाई में सुधार दिख सकता है। इसलिए जो निवेशक लंबी अवधि का नजरिया रखते हैं, उनके लिए यह गिरावट डर नहीं बल्कि एक मौका भी बन सकती है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।