उद्योग के जानकारों का कहना है कि चंद्रशेखरन का एक और कार्यकाल न लेने का फैसला पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे थे कि उनकी दोबारा नियुक्ति का विरोध हो सकता है।
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के एक और कार्यकाल के लिए आगे नहीं बढ़ने के फैसले ने टाटा समूह की संचालन संरचना पर सबका ध्यान आकर्षित किया है। इससे चेयरमैन के उत्तराधिकार से कहीं आगे के सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासनिक क्षेत्र के जानकार टाटा की प्रशासनिक संरचना से पैदा होने वाली चुनौतियों की ओर इशारा कर रहे हैं। इसमें निदेशक मंडल और शेयरधारकों के बीच मतभेदों को सुलझाने की जरूरत से लेकर नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखने तक के मसले शामिल हैं। इस घटनाक्रम से टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स, होल्डिंग कंपनी के निदेशक मंडल और इसके पेशेवर प्रबंधन के बीच के संबंध चर्चा में आ गए हैं।
टाटा ट्रस्ट्स का असर केवल उसकी बहुलांश हिस्सेदारी तक ही सीमित नहीं है। टाटा संस की आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत दो मुख्य ट्रस्ट – सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट मिलकर होल्डिंग कंपनी के निदेशक मंडल के एक-तिहाई निदेशकों को नामित कर सकते हैं, बशर्ते उनके पास संयुक्त रूप से कंपनी की सामान्य शेयर पूंजी का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा हो। ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों को आर्टिकल 121 के तहत कुछ खास मामलों पर अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स (सहमति देने या न देने के अधिकार) भी मिलते हैं, जिससे उन्हें अहम रणनीतिक फैसलों पर प्रभावी वीटो मिल जाता है।
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक और प्रबंधन निदेशक अमित टंडन ने कहा, ‘इसका मतलब है कि परोपकारी संस्थाएं असल में भारत के सबसे बड़े कंपनी समूहों में से एक का प्रभावी रूप से संचालन करती हैं। इस दोहरेपन की वजह से बार-बार तनाव पैदा होता रहा है और नेतृत्व में निरंतरता तथा लंबे समय तक स्थिरता बनाए रखने के लिए इसे सुलझाना जरूरी है।’
साल 2022 में टाटा संस ने अपने नियमों में बदलाव करके मालिकाना हक की निगरानी और प्रबंधन के बीच औपचारिक रूप से अलग-अलग व्यवस्था बनानी चाही थी, ताकि दो मुख्य ट्रस्टों में से किसी का भी चेयरमैन एक ही समय में टाटा संस का चेयरमैन न बन सके। हालांकि मौजूदा गतिरोध यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इन दोनों पदों को अलग करना काफी है, जबकि नियंत्रक शेयरधारक के पास अब भी निदेशक मंडल के स्तर के व्यापक अधिकार हैं। टंडन ने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि नेतृत्व में बदलाव का असर उन सक्रिय कारोबारों पर पड़ेगा जो स्वतंत्र निदेशक मंडल, दमदार प्रबंधन टीम और स्पष्ट रणनीतियों के साथ चलते रहेंगे।
उद्योग के जानकारों का कहना है कि चंद्रशेखरन का एक और कार्यकाल न लेने का फैसला पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे थे कि उनकी दोबारा नियुक्ति का विरोध हो सकता है।