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कमोडिटी डेरिवेटिव में पोजीशन लिमिट और मार्जिन ढांचा आसान करेगा सेबी

इस कदम का मकसद जोखिम को नियंत्रण में रखते हुए निवेशकों के लिए गैर-जरूरी लागत कम करना है

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खुशबू तिवारी   
Last Updated- August 12, 2026 | 11:29 PM IST

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) जिंस डेरिवेटिव कारोबार में पोजीशन लिमिट और मार्जिन ढांचा आसान बनाने पर विचार कर रहा है। इस कदम का मकसद जोखिम पर नियंत्रण रखते हुए निवेशकों के लिए गैर-जरूरी लागत कम करना है। सेबी अध्यक्ष तुहिन कांत पांडेय ने बुधवार को यह जानकारी दी।

पोजीशन लिमिट वह अधिकतम सीमा है जो एक्सचेंज या नियामक द्वारा तय की जाती है। इसके तहत कोई कारोबारी या संस्था शेयरों या डेरिवेटिव (वायदा एवं विकल्प) अनुबंधों की एक निश्चित संख्या से अधिक पोजीशन नहीं रख सकती।

पांडेय ने कहा कि बाजार नियामक एक्सचेंज प्रणाली के जरिये जिंस आपूर्ति करने या प्राप्त करने वाले कारोबारियों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर माल एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद के साथ बातचीत भी जारी रखेगा।

पांडेय ने एमसीएक्स ग्लोबल कमोडिटी कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में कहा,‘भारत के जिंस डेरिवेटिव बाजार का अगला चरण केवल सौदों के मूल्य (टर्नओवर) ने नहीं बल्कि उपयोगिता से तय होना चाहिए। इसका मतलब है कि बाजार वास्तविक अर्थव्यवस्था में कीमतें तय करने और जोखिम प्रबंधित करने में कितनी प्रभावी ढंग से मदद करते हैं।’

पांडेय ने कहा कि कृषि जिंसों के लिए पोजीशन लिमिट पर बातचीत पूरी हो गई है और जल्द ही दिशानिर्देश भी जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सेबी कारोबारियों को आसान और अधिक कुशल बनाने की कोशिशों के तहत अपने मार्जिन ढांचे की भी समीक्षा कर रहा है।

उन्होंने कहा कि सेबी ने बाजार अवसंरचना संस्थान (एमआईआई) को नियंत्रित करने वाले प्रमुख परिपत्र की समीक्षा के तहत कारोबार सुगमता के कई उपायों पर बातचीत भी पूरी कर ली है। इनमें एक्सचेंज स्तर पर पर एक ही निवेशक सुरक्षा कोष रखना, किसानों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को ऑप्शंस ऑन फ्यूचर में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना, ‘क्लोज-टु-द-मनी’ढांचा हटाकर वस्तुओं में विकल्प अनुबंध (ऑप्शंस इन गुड्स) आसान बनाना और एक्सचेंज-ट्रेडेड कमोडिटी डेरिवेटिव के लिए सभी तरह के निवेशकों को बाजार तक सीधी पहुंच देनी शामिल है। ‘क्लोज-टु-द-मनी’वह विकल्प (ऑप्शन) अनुबंध है जिसकी स्ट्राइक प्राइस मौजूदा हाजिर कीमत या निपटान मूल्य के सबसे करीब होती है।

सेबी अध्यक्ष ने कहा,‘हमने जीएसटी परिषद सचिवालय को भेज प्रस्ताव में कहा है कि जिंस बाजार में डिलिवरी के समय भंडारण कहीं भी हो सकता है। लिहाजा सभी राज्यों में अलग-अलग पंजीकरण के बजाय इसे एसजीएसटी ढांचे की जगह आईजीसटी ढांचे के तहत लाया जा सकता है। हम जीएसटी परिषद के साथ और बातचीत करेंगे जिसमें राज्य और केंद्र दोनों शामिल हैं। हम व्यावहारिक समाधान निकालने के लिए एक्सचेंजों के साथ भी बातचीत करेंगे।’

कई कारोबारियों और बिचौलियों ने पहले ही जीएसटी से जुड़े मुद्दों पर बाजार नियामक के सामने अपनी बात रखी है। मौजूदा व्यवस्था के तहत एक्सचेंज से जुड़ी डिलिवरी के लिए बिचौलियों को हर उस राज्य में अलग-अलग जीएसटी पंजीयन कराने पड़ सकते हैं जहां डिलिवरी केंद्र स्थित है। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि लेन-देन एक्सचेंजों के केंद्रीकृत ढांचे के जरिये किए और निपटाए जाते हैं।

जानकारों का कहना है कि इससे अलग-अलग राज्यों में कर से जुड़े विवरण, कई पंजीकरण, मिलान की चुनौतियां और परिचालन लागत बढ़ सकती है। उनका कहना है कि ऐसी डिलिवरी को आईजीएसटी के तहत अंतर-राज्य आपूर्ति से टैक्स क्रेडिट का आसानी से प्रवाह हो सकता है और मौजूदा ढांचे के जरिये गंतव्य राज्यों को कर आवंटन सुनिश्चित करते हुए केंद्रीकृत अनुपालन हो सकता है। 

एक दिन पहले बाजार नियामक ने एक सोची-समझी ढांचे के जरिये जिंस सूचकांक और भौतिक निपटान होने वाले गैर-कृषि अनुबंधों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की व्यापक भागीदारी के लिए एक परामर्श पत्र जारी किया था।

उन्होंने कहा,‘व्यावसायिक और संस्थागत भागीदारों का बेहतर मिश्रण तरलता, बेहतर मूल्य प्राप्ति, और हेजिंग अधिक असरदार बनाएगा।’ पांडेय ने कहा कि भारत का जिंस डेरिवेटिव बाजार तेजी से बढ़ा है जिसमें वायदा कारोबार के तहत हुए सभी सौदों का मूल्य 133 प्रतिशत बढ़कर 2025-26 में 166.4 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इस वर्ष साल के दौरान ऑप्शंस प्रीमियम टर्नओवर यानी विकल्प अनुबंधों के लिए भुगतान किए गए कुल प्रीमियम का योग दोगुना से अधिक बढ़कर 16.8 लाख करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों में टर्नओवर पहले से ही पिछले वित्त वर्ष के टर्नओवर का लगभग 65 प्रतिशत तक पहुंच गया था।

पांडेय ने कहा, ‘भारत कई वस्तुओं का एक प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता है। क्या इस आर्थिक शक्ति का लाभ उठाकर हम मूल्य निर्धारण पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं? क्या हम मूल्य ग्रहण करने वाले से मूल्य निर्धारक बन सकते हैं?’

सेबी इस क्षेत्र में पूंजी दक्षता में सुधार लाने के लिए भी काम कर रहा है। नियामक ने सुरक्षा उपायों को बरकरार रखते हुए निपटान गारंटी निधि ढांचे की समीक्षा की है और विकल्प अनुबंधों में शीघ्र भुगतान का लाभ बढ़ाया है। इससे पूंजी मुक्त करने और भागीदारी लागत को कम करने में मदद मिलती है। सेबी ने अपने बाजार विनियमन विभाग के भीतर जिंस डेरिवेटिव के लिए एक समर्पित विभाग बनाया है। पांडेय ने कहा कि इस कदम से इस क्षेत्र में अधिक विशेषज्ञता, बाजार के साथ अधिक जुड़ाव और नियामकीय ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।

First Published : August 12, 2026 | 11:25 PM IST