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क्लोजिंग एक्शन सेशन में म्युचुअल फंड्स की कम भागीदारी, सेबी ने बुलाई बैठक

सेबी प्रमुख तुहिन कांत पांडेय ने बुधवार को सीएएस शुरू होने पर अपना पहला सार्वजनिक बयान दिया। उन्होंने कहा कि बाजार नियामक सभी संबंधित पक्षों से सुझाव ले रहा है

Published by
अभिषेक कुमार   
खुशबू तिवारी   
Last Updated- August 12, 2026 | 11:28 PM IST

बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) हाल में शुरू हुई क्लोजिंग एक्शन सेशन (सीएएस) व्यवस्था में म्युचुअल फंडों के कम शिरकत करने की वजह समझना चाह रहा है। इस पूरे मामले से वाकिफ सूत्रों ने कहा कि सेबी ने इस बात की थाह लेने के लिए मंगलवार को म्युचुअल फंडों के साथ एक बैठक की। 

सूत्रों ने कहा कि इस बैठक में अलग-अलग आकार की म्युचुअल फंड कंपनियों के वरिष्ठ फंड प्रबंधक और कारोबारी शामिल हुए। बैठक में नई नीलामी प्रणाली में भाग लेने में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों और इन्हें दुरुस्त करने के तरीकों पर चर्चा हुई। यह बैठक सीएएस शुरू होने के बाद बाजार से जुड़े कारोबारियों के साथ सेबी की बातचीत का ही हिस्सा है।

सेबी प्रमुख तुहिन कांत पांडेय ने बुधवार को सीएएस शुरू होने पर अपना पहला सार्वजनिक बयान दिया। उन्होंने कहा कि बाजार नियामक सभी संबंधित पक्षों से सुझाव ले रहा है ताकि उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके। पांडेय ने कहा, ‘हम उनके सुझाव ले रहे हैं। जब भी कोई बदलाव होता है तो उसे समझने में थोड़ा वक्त तो लग ही जाता है।’

उन्होंने कहा कि सीएएस में म्युचुअल फंडों की भागीदारी 5-7 फीसदी से बढ़कर अब लगभग 20-25 फीसदी हो गई है। उन्होंने कहा कि अनुबंध निपटान (एक्सपायरी) की तारीखों के आसपास प्रोप्राइटरी ट्रेडर्स की भागीदारी अधिक देखी जाती है।

प्रोप्राइटरी ट्रेडर ऐसे कारोबारी या वित्तीय संस्थान हैं जो किसी ग्राहक के पैसों से नहीं बल्कि कंपनी या बैंक की रकम से शेयर बाजार, बॉन्ड, जिंस और मुद्राओं में व्यापार करते हैं।

पांडेय ने कहा,‘अगर इसमें बदलाव या सुधार की जरूरत हुई तो हम उस पर भी विचार करेंगे। मगर अभी समस्या यह है कि समझ की कमी है क्योंकि पहले एल्गो और दूसरे कारोबारियों ने अपने ढांचे पुरानी प्रणाली पर तैयार किए थे। हमें सतर्क रहना होगा मगर लगातार प्रयास भी करते रहना चाहिए। समझ न आना कोई बड़ी बात नहीं है और मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।’

उन्होंने कहा,‘सीएएस एक ढांचागत सुधार है। असल में हम इसमें पीछे रहे हैं। दुनिया के ज्यादातर देश जैसे अमेरिका, जर्मनी, जापान, हॉन्ग कॉन्ग और ऑस्ट्रेलिया इसे पहले ही लागू कर चुके हैं। पैसिव फंड के एनएवी के लिए एक ही कीमत होना जरूरी है। पुरानी प्रणाली में एक समस्या यह थी कि कारोबार बंद होने के समय कीमतों में हेरफेर का जोखिम था और आखिरी कुछ मिनटों में होने वाले कारोबार पर बहुत अधिक असर पड़ता था। साथ ही, ढांचागत तौर पर पैसिव स्कीम के लिए ट्रैकिंग एरर कम करना भी जरूरी था।’

सेबी प्रमुख ने यह साफ किया कि बाजार नियामक को कोई हेरफेर नजर नहीं आई है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन किया जा रहा है। बंद भाव (क्लोजिंग प्राइस) को लेकर अनिश्चितता की वजह से कई फंड कंपनियां सीएएस से दूर रही हैं। 3 अगस्त को शुरू इस नई प्रणाली को शुरुआती दिनों में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा। नीलामी के दौरान शेयर की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव ने बंद कीमत की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ा दी।

मंगलवार को हुई बैठक में एमएफ कंपनियों का एक सुझाव यह था कि सीएएस के साथ-साथ लगातार कारोबार की इजाजत भी दी जाए। फंड प्रबंधकों ने यह भी सुझाव दिया कि सीएएस कारोबार का निपटान ‘टी+2’ आधार पर हो जिससे कारोबार उम्मीद के अनुरूप नहीं होने पर उन्हें अगले दिन अपनी पोजीशन प्रबंधित करने की सुविधा मिले। उन्होंने शेयर किराये पर लेने एवं देने के एक कुशल ढांचे (स्टॉक लेंडिंग और बॉरोइंग मैकेनिज्म) की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक ऐसा करना सीएएस के सही ढंग से काम करने के लिए बहुत जरूरी होगा। इस खबर के लिखे जाने तक सेबी को भेजे गए ई-मेल का कोई जवाब नहीं आया था।

सेबी अध्यक्ष ने कहा कि बड़ी ब्रोकरेज कंपनियां या क्वालिफाइड स्टॉक ब्रोकर (सेबी द्वारा तय) की सूची में आने वाली ब्रोकरेज कंपनियां या तो सांकेतिक मूल्य दिखाना शुरू कर चुकी हैं या 14 अगस्त तक ऐसा करना शुरू कर देंगी। पांडेय ने कहा,‘लोगों को नई प्रणाली समझने में आम तौर पर समय लगता है। सांकेतिक मूल्य अभी भी जरूरी हैं। यह कोई ब्लैक बॉक्स नहीं है और जिन दामों पर बोलियां आ रही हैं वे दिखाए जा रहे हैं। यह बस एक तरह का एकीकरण है। रैंडम क्लोज इसलिए रखा गया है ताकि आखिरी मिनट में कारोबार पर कोई असर न पड़े। 

अब इस प्रणाली में लोगों की भागीदारी और समझ बढ़ाने की जरूरत है। कई ब्रोकरेज कंपनियां पहले ही अनुमानित मूल्य दिखा रही हैं और बाकी कंपनियां भी 14 अगस्त तक इसे शुरू कर देंगी। सीएएस एक पारदर्शी प्रणाली है और इसमें कीमतें साफ तौर पर दिखती हैं।’ हालांकि सोशल मीडिया पर कुछ ग्रुप्स ने बुधवार को ‘नो ट्रेड डे’ (बिना कारोबार वाला दिन) की अपील की थी मगर ब्रोकरेज कंपनियों का कहना है कि इसका कोई असर नहीं हुआ। 

एक ब्रोकरेज कंपनी ने कहा,‘कारोबार रोकने की ऐसी अपील आमतौर पर तब असर करती थीं जब ‘आउटक्राई’ सिस्टम यानी ऊंची आवाज में बोली लगाने वाली प्रणाली काम करती थी। अब प्रणाली विकेंद्रीकृत हो चुकी है और इसमें भागीदारी बहुत अधिक बढ़ चुकी है।’ 

First Published : August 12, 2026 | 11:21 PM IST