रेलवे ने रद्द किया चीनी कंपनी का ठेका

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 12:34 PM IST

भारत और चीन के बीच लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसात्मक झड़प के बीच भारतीय रेलवे ने समर्पित मालढुलाई गलियारा (डीएफसी) के लिए चीन की एक कंपनी को दिए गए बड़े ठेके को रद्द करने का फैसला किया है। इस सिलसिले में सरकार डीएफसी परियोजना के लिए धनराशि मुहैया कराने वाले विश्व बैंक से भी संपर्क साध चुकी है। रेलवे ने गुरुवार को जारी बयान में कहा कि मालढुलाई गलियारे के कानपुर-दीनदयाल उपाध्याय (मुगल सराय) खंड में सिग्नल एवं दूरसंचार कार्यों के लिए दिए गए 471 करोड़ रुपये के ठेके को खराब प्रगति देखते हुए निरस्त किया जा रहा है। यह खंड पूर्वी मालवहन गलियारे का हिस्सा है जिसे रेलवे का ही उपक्रम समर्पित मालढुलाई गलियारा निगम (डीएफसीसीआईएल) बना रहा है।
इस परियोजना के लिए धन का इंतजाम विश्व बैंक से कर्ज लेकर किया गया है। लिहाजा अगर ठेका रद्द किया जाता है तो विश्व बैंक से मंजूरी लेना जरूरी होता है। रेलवे के एक अधिकारी ने बताया कि अगर विश्व बैंक इस परियोजना से अपने हाथ पीछे खींच लेता है तो सरकार खुद भी वित्त पोषण करने पर विचार कर सकती है।
चीनी कंपनी को वर्ष 2016 में ठेका दिए जाने के बाद से अब तक केवल 20 फीसदी कार्य ही पूरा किया गया है। कार्य में इस देरी की वजह से मालढुलाई परियोजना से जुड़ी कई समयसीमाएं प्रभावित हो रही हैं। रेलवे पिछले दो महीने से यह ठेका रद्द करने के बारे में सोच रहा था लेकिन सीमा पर पैदा हुए तनाव ने इस फैसले में उत्प्रेरक का काम किया है।
डीएफसीसीआईएल ने करार रद्द करने के लिए चीनी कंपनी का तकनीकी जानकारियां देने में आनाकानी, कार्यस्थल पर इंजीनियर न होना, स्थानीय एजेंसी के साथ गठजोड़ न होने से कार्य पूरा होने में विलंब, उपकरणों की खरीद में देरी और कंपनी के साथ कई बैठकों के बावजूद कार्य में कोई प्रगति न होने को कारण बताया है।
रेलवे के दस्तावेज में कहा गया है, ‘परियोजना की खराब प्रगति को देखते हुए डीएफसीसीआईएल ने यह ठेका निरस्त करने का फैसला किया है।’ डीएफसी परियोजना के पूर्वी खंड (मुगल सराय- इलाहाबाद- कानपुर-खुरजा-दादरी और खुर्जा-लुधियाना) को विश्व बैंक 13,625 करोड़ रुपये कर्ज देकर वित्त पोषण कर रहा है जबकि पश्चिमी खंड के लिए जापान इंटरनैशनल कॉर्पोरेशन एजेंसी( जेआईसीए) ने 38,722 करोड़ रुपये का कर्ज दिया हुआ है। वैसे परियोजना के पूर्वी खंड की कुल लागत करीब 30,358 करोड़ रुपये आंकी गई है जबकि पश्चिमी खंड के निर्माण पर 51,101 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। चीनी कंपनी का करार रद्द करने का फैसला ऐसे समय आया है जब रेलवे और विश्व बैंक पूर्वी गलियारे के अंतिम चरण की फंडिंग पर बात कर रहे हैं। बिहार के सोननगर और पश्चिम बंगाल के दनकुनी के बीच के 538 किलोमीटर लंबे इस खंड के निर्माण पर करीब 15,000 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर धन जुटाने की तैयारी है।
इस बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता जितेंद्र आव्हाड ने केंद्र सरकार से दिल्ली-मेरठ मेट्रो परियोजना के लिए चीन की कंपनी शान्गेई टनल इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एसटीईसी) को दिया गया ठेका रद्द करने की मांग की है।
एसटीईसी का भारतीय निर्माण कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) के साथ एक संयुक्त उद्यम भी है। इस उद्यम को मुंबई में भूमिगत मेट्रो कॉरिडोर के दो ठेके वर्ष 2016 में दिए गए थे। पहले एसटीईसी को मुंबई मेट्रो नेटवर्क से जुड़ा ठेका भी मिला था।
इस बारे में प्रतिक्रिया के लिए एलऐंडटी और टाटा प्रोजेक्ट्स को भेजे गए ईमेल के कोई जवाब नहीं मिले हैं। वहीं मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) के आयुक्त आर ए राजीव ने कहा, ‘मुंबई मेट्रो के इस पैकेज के लिए प्राथमिक बोलीकर्ता तो टाटा प्रोजेक्ट्स है लिहाजा मुझे चिंता की कोई बात नहीं नजर आती है।’ यह प्राधिकरण ही मुंबई मेट्रो के चौथे कॉरिडोर की नोडल एजेंसी है।
मुंबई मेट्रो नेटवर्क से जुड़े काम में लगी अन्य चीनी कंपनियों में चाइना हार्बर इंजीनियरिंग भी शामिल है। वर्ष 2018 में चाइना हार्बर और टाटा प्रोजेक्ट्स के एक संयुक्त उद्यम को चौथे कॉरिडोर के नौवें एवं 11वें पैकेज के ठेके दिए गए थे।
दूरसंचार विभाग पहले ही दो सार्वजनिक उपक्रमों बीएसएनएल एवं एमटीएनएल को यह कह चुका है कि 4जी तकनीक की तरफ बढऩे की प्रक्रिया में वे चीन में बने दूरसंचार उपकरणों का इस्तेमाल न करें।

First Published : June 18, 2020 | 10:22 PM IST