वाहन निर्माता कंपनियों ने सरकार से वाहन क्षेत्र में उत्पादन-से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन (डीवीए) की गणना के लिए फिक्स्ड विनिमय दर (फॉरेक्स) दर अपनाने को कहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड को पता चला है कि ऐसा इसलिए है कि हाल में रुपये की कीमत घटने से कुछ वाहनों का स्थानीयकरण स्तर कृत्रिम रूप से कम हो रहा था और रियायत के लिए जरूरी था कि वे न्यूनतम दायरे के करीब पहुंचें।
25,938 करोड़ रुपये वाली वाहन पीएलआई योजना के तहत पात्र किसी गाड़ी के मॉडल में आयात किए गए पुर्जों या मैटेरियल की मात्रा 50 प्रतिशत तक सीमित होनी चाहिए, यानी उसकी कुल कीमत (रुपये में) का आधे से भी कम हिस्सा आयात किया जा सकता है। डीवीए की गणना मॉडल की एक्स-फैक्ट्री कीमत में से आयात सामग्री की कीमत घटाकर की जाती है।
पिछले सप्ताह भारी उद्योग मंत्रालय (एमएचआई) और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) के साथ हुई बैठक में वाहन उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि पिछले एक साल में प्रमुख विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ है।
28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका की ईरान पर बमबारी के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण रुपये की कीमत में गिरावट और बढ़ गई। परिणामस्वरूप, आयात किए गए पुर्जों की रुपये में कीमत बढ़ गई, जबकि आयात की वास्तविक मात्रा में कोई बदलाव नहीं हुआ।
वाहन निर्माताओं ने बताया कि इससे कागज पर डीवीए प्रतिशत कम दिखता है, जबकि स्थानीयकरण का वास्तविक स्तर वही बना रहता है। पिछले एक साल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 10.7 प्रतिशत कमजोर हुआ है। इस दौरान एक्सचेंज दर 6 जून, 2025 को 85.78 रुपये प्रति डॉलर से गिरकर 6 जून, 2026 को 94.95 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गई।
एमएचआई के तहत काम करने वाली टेस्टिंग एजेंसी एआरएआई की यह जिम्मेदारी है कि वह ऑटो पीएलआई योजना के तहत रियायत का दावा करने वाले वाहन मॉडलों के लोकलाइजेशन लेवल की जांच करे।