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स्वास्थ्य केंद्रों में 80 फीसदी विशेषज्ञों की जरूरत

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Last Updated- December 10, 2022 | 11:12 AM IST

राज्यों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी)  में सर्जन, प्रसूति व स्त्री रोग और फिजि​शियन जैसे स्वास्थ्य विशेषज्ञों की अत्यधिक कमी है। यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया आंकड़ों से मिली है। इन केंद्रों में 2020 में 76.09 फीसदी और 2021 में 79.90 फीसदी पद खाली थे। कोरोना-19 के कारण दो साल रिक्तियां भरने का कार्य प्रभावित हुआ। 
इन केंद्रों में साल 2020 में 20,732 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जरूरत थी लेकिन केवल 4,957 स्थान ही भरे गए थे। ‘आरबीआई हैंडबुक ऑफ स्टेटिक्स ऑन इंडियन स्टेट्स’के आंकड़ों के मुताबिक ऐसे में साल 2021-22 में केवल 24 फीसदी जरूरतें ही पूरी हो पाई थीं।

साल 2021 में इन केंद्रों पर 21,924 पदों की जरूरत थी लेकिन केवल 4,405 स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही अपनी सेवाएं दे पा रहे थे। इसका मतलब यह है कि पदों में कमी साल 2020 के 76 फीसदी से बढ़कर साल 2021 में 80 फीसदी हो गई थी। 
बीते सालों के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके अनुसार साल 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 81 फीसदी पदों को भरा नहीं गया था। इसके मायने यह हैं कि इन सालों से सीएचसी में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की विशेषज्ञता में कमी की कमोबेश एक जैसी स्थिति रही।हाल में चुनाव की प्रक्रिया से गुजर रहे गुजरात और हिमाचल प्रदेश में स्थिति अत्यधिक खराब है।

गुजरात में 2021 के दौरान सीएचसी में 1,280 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जरूरत थी लेकिन केवल 74 स्वास्थ्य विशेषज्ञ थे। इसका अर्थ यह है कि जितने विशेषज्ञों की जरूरत थी, उसके मुकाबले केवल छह फीसदी ही नियुक्तियां थीं और 94 फीसदी पदों को खाली छोड़ दिए गए थे। हिमाचल प्रदेश में 312 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जरूरत थी लेकिन केवल सात स्वास्थ्य विशेषज्ञ नियुक्त थे। इसका मतलब यह हुआ कि जितनी जरूरत थी, उसके मुकाबले केवल दो फीसदी की नियुक्ति थी।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एलोपैथिक डॉक्टरों की उपलब्धता की बात की जाए तो स्थिति इतनी खराब नहीं थी। जैसे इन केंदों में 25,140 डॉक्टरों की जरूरत थी लेकिन इनमें 1084 डॉक्टरों की कमी थी। इस तरह एलोपैथिक डॉक्टरों की मांग के अनुरूप चार फीसदी ही कमी थी।

सामाजिक खर्च

कोविड की दो लहरों के कारण राज्यों के सामाजिक क्षेत्र पर खर्चा तेजी से बढ़ा। राज्यों ने 2018-19 में 13.4 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसके अगले साल 2019-20 में बीते साल की तुलना में पांच फीसदी अधिक 14.1 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। हालांकि 2020-21 में खर्चा 20.98 फीसदी उछल कर 17.1 लाख करोड़ (संशोधित अनुमान) हो गया था। 
इसका कारण यह था कि राज्यों ने गरीबों के लिए व्यापक स्तर पर सामाजिक कल्याण योजनाएं शुरू की थीं और केंद्र ने कोरोना की पहली लहर व कुछ महीनों के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण राज्यों के वित्तीय घाटे की सीमा में रियायत दे दी थी। साल 2021-22 में देश ने जब कोरोना की दूसरी लहर का कहर झेला तब खर्चा 14 फीसदी बढ़कर 19.4 लाख करोड़ (बजट अनुमान) हो गया था।

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First Published - November 21, 2022 | 10:02 PM IST

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