भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI के जरिए बड़ी रकम के ट्रांसफर पर नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर शेयर ब्रोकर्स की ओर से उठाई गई चिंताओं पर गौर कर सकता है। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने गुरुवार को यह जानकारी दी।
कैपिटल मार्केट से जुड़े लेनदेन के लिए MDR ट्रांजैक्शन वैल्यू का 0.02 फीसदी तय किया गया है। इस पर अधिकतम 300 रुपये की सीमा होगी। यह शुल्क म्युचुअल फंड, सिक्योरिटीज, स्टॉक ब्रोकर्स, डीलर्स और निवेश सलाहकारों को किए जाने वाले भुगतान पर लागू होगा। ये बदलाव 15 अक्टूबर से लागू होंगे। हालांकि, म्युचुअल फंड SIP जैसे बार-बार होने वाले स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन या UPI मैंडेट पर MDR शुल्क नहीं लगेगा।
नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट के इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव से इतर पांडे ने कहा, “मुझे लगता है कि इसमें कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। हम निश्चित रूप से इन पर गौर करेंगे और देखेंगे कि इन्हें कैसे आसान बनाया जा सकता है।”
MDR को लेकर ब्रोकर्स को क्या है चिंता?
कई ब्रोकर्स ने इस शुल्क को लेकर चिंता जताई है। सेबी के नियमों के तहत ब्रोकर्स को समय-समय पर ग्राहकों की इस्तेमाल नहीं हुई रकम वापस करनी होती है, जिसे क्लाइंट फ्लोट कहा जाता है। सेबी यह नियम इसलिए लेकर आया था ताकि ग्राहकों की इस रकम का किसी तरह गलत इस्तेमाल न हो।
डिस्काउंट ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म जीरोधा के संस्थापक नितिन कामथ ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, “नियम के कारण हर महीने या तिमाही में इस रकम को ट्रांसफर करना जरूरी हो जाता है। जब पैसा वापस आता है तो ब्रोकर को इसका खर्च उठाना पड़ सकता है, जबकि इससे उसे कोई अतिरिक्त फायदा या कमाई नहीं होती।”
कई अन्य ब्रोकर्स ने भी कहा है कि यह शुल्क उनके लिए बार-बार होने वाला परिचालन खर्च बन जाएगा, जो करोड़ों रुपये तक पहुंच सकता है। वहीं इससे ब्रोकर के लिए कोई अतिरिक्त ट्रेड या कमाई पैदा नहीं होगी।
ब्रोकर्स के लिए पेमेंट प्रोसेसिंग सेवाएं देने वाली कंपनियों का कहना है कि कुछ ब्रोकर UPI के बजाय नेटबैंकिंग को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसकी वजह यह है कि नेटबैंकिंग ट्रांजैक्शन पर करीब 8 रुपये से 12 रुपये का तय शुल्क लगता है। यह शुल्क बैंकों और पेमेंट प्रोसेसिंग कंपनियों के बीच बातचीत के आधार पर तय होता है।
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REITs, InvITs और बॉन्ड मार्केट पर क्या बोले सेबी चेयरमैन?
कॉन्फ्रेंस में सेबी चेयरमैन ने यह भी कहा कि रेगुलेटर रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी REITs और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी InvITs में निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने, कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट को मजबूत करने और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड यानी AIF के नियमों को आगे विकसित करने पर ध्यान देगा।
उन्होंने कहा कि REITs और InvITs में घरेलू संस्थागत निवेशकों, वैश्विक लंबी अवधि के निवेशकों और रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने की गुंजाइश है। वहीं कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट में ज्यादा कंपनियों को बॉन्ड जारी करने, निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने और सेकेंडरी मार्केट में लिक्विडिटी बेहतर करने की जरूरत है।
अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड यानी AIF को लेकर सेबी ने एक्रेडिटेड इन्वेस्टर फ्रेमवर्क की समीक्षा का प्रस्ताव दिया है। इसका मकसद अनुभवी और जानकार निवेशकों की पहुंच बढ़ाना, घरेलू और विदेशी जोखिम पूंजी का दायरा बढ़ाना और बाजार के पूरे सिस्टम को मजबूत करना है।
पांडे ने म्युनिसिपल फाइनेंस यानी शहरों की वित्तीय जरूरतों के लिए फंड जुटाने की व्यवस्था को मजबूत करने को भी प्राथमिकता बताया। शहरों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए ज्यादा बेहतर और आधुनिक फाइनेंसिंग व्यवस्था की जरूरत होगी।
उन्होंने कहा कि संस्थागत क्षमता बढ़ाना, गवर्नेंस में सुधार करना और वित्तीय जानकारी को ज्यादा पारदर्शी बनाना निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए जरूरी होगा। इससे म्युनिसिपल बॉन्ड शहरी बुनियादी ढांचे के लिए फंड जुटाने का ज्यादा अहम जरिया बन सकते हैं।
