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प्राइवेट रॉकेट ‘विक्रम-1’ की उड़ान के साथ अंतरिक्ष में बड़ी कामयाबी हासिल, क्या भारत बनेगा दुनिया का नया स्पेस हब?

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सरकारी सुधारों से मजबूत हुआ भारत का स्पेस सेक्टर अब इतिहास रचने को तैयार है, जहां पहला प्राइवेट रॉकेट 'विक्रम-1' बंपर कमर्शियल लॉन्चिंग को नई उड़ान देगा

Last Updated- July 18, 2026 | 1:57 PM IST
Skyroot Aerospace Vikram 1
'स्काईरूट एयरोस्पेस' का 'विक्रम-1' रॉकेट | फाइल फोटो

भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में इन दिनों एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसकी उम्मीद कुछ साल पहले तक किसी को नहीं थी। भारत सरकार के बड़े सुधारों और नई नीतियों के कारण देश का स्पेस प्रोग्राम अब सिर्फ सरकारी वैज्ञानिकों तक ही सीमित नहीं रह गया है। इस समय पूरी दुनिया की नजरें ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ नाम की कंपनी के ‘विक्रम-1’ रॉकेट की लॉन्चिंग पर टिकी हैं। यह भारत का पहला ऐसा रॉकेट है, जिसे पूरी तरह से एक प्राइवेट कंपनी ने तैयार किया है। यह रॉकेट इस बात का सबूत है कि सरकार से छूट मिलने के बाद देश की प्राइवेट कंपनियां आसमान छूने के लिए तैयार हैं।

सरकार ने साल 2023 में नई स्पेस पॉलिसी लाकर अंतरिक्ष से जुड़े हर काम के रास्ते प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल दिए हैं। इसका असर यह हुआ कि देश में नए आइडिया और नए निवेश की बाढ़ आ गई है। प्राइवेट कंपनियां अब सिर्फ छोटे-मोटे पुर्जे नहीं बना रहीं, बल्कि खुद के सैटेलाइट और रॉकेट तैयार कर रही हैं।

आंकड़ों की बात करें तो साल 2014 में देश में सिर्फ एक स्पेस स्टार्टअप था, जो आज बढ़कर 400 से भी ज्यादा हो चुका है। भारत की स्पेस इकोनॉमी अभी करीब 8.4 अरब डॉलर की है, जिसके साल 2030 तक पांच गुना बढ़कर 40 से 45 अरब डॉलर होने का अनुमान है। सरकार का लक्ष्य इसे साल 2040 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का है।

क्या है ‘मिशन आगमन’ और ‘विक्रम-1’ की खासियत

स्काईरूट एयरोस्पेस का बनाया ‘विक्रम-1’ एक बेहद आधुनिक रॉकेट है। यह अपने साथ 350 किलोग्राम तक का वजन लेकर अंतरिक्ष की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में जा सकता है। यह रॉकेट सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में उनकी सही जगह पर पहुंचाएगा, जिससे हमारे मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, नेविगेशन और मौसम की जानकारी जैसी सेवाओं को मजबूती मिलेगी। इस रॉकेट को बनाने में खास कार्बन बॉडी और 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

विक्रम-1 को ‘मिशन आगमन’ के तहत आज आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा में ISRO के सतीश धवन स्पेस सेंटर से दोपहर 12:05 बजे लॉन्च किया गया। यह रॉकेट जमीन से 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ेगा और अपने साथ कई ग्राहकों के सैटेलाइट लेकर गया है। इसमें स्काईरूट का अपना ‘SCOPE’ सैटेलाइट और ‘Embrace’ नाम का एक खास रोबोटिक सिस्टम शामिल है, जो अंतरिक्ष में तैर रहे कचरे को इकट्ठा करने का काम करेगा।

इस पहली उड़ान में यादगार के तौर पर दो खास चीजें भी भेजी गई हैं, जिसमें एक फूलों के आकार की सुंदर कलाकृति है और दूसरा 18-कैरेट सोने से बना एक बहुत छोटा रॉकेट। इस सोने के छोटे रॉकेट पर भारत के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन, विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं, जो चावल के दाने से भी छोटी हैं।

सिंगल-विंडो सिस्टम ‘इन-स्पेस’ और नए फंड्स से मिली मदद

निजी कंपनियों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें, इसके लिए सरकार ने ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) नाम की एक संस्था बनाई है। यह संस्था प्राइवेट कंपनियों के प्रोजेक्ट्स को एक ही जगह से फटाफट मंजूरी देती है।

आंकड़ों के मुताबिक, अब तक इस संस्था के साथ 4,500 से ज्यादा संगठन जुड़ चुके हैं और इसने 133 मंजूरियां जारी की हैं। इसकी मदद से साल 2025 में स्पेस स्टार्टअप्स को 150 मिलियन डॉलर का बड़ा निवेश मिला है।

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प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप्स को पैसों की तंगी न हो, इसके लिए सरकार तीन बड़े फंड चला रही है:

  • इन-स्पेस सीड फंड स्कीम: यह योजना शुरुआती दौर के छोटे उद्योगों और स्टार्टअप्स को नई तकनीक विकसित करने के लिए 1 करोड़ रुपये तक की मदद देती है। यह पैसा खासतौर पर खेती और आपदा प्रबंधन से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए मिलता है।
  • ₹1,000 करोड़ का वीसी फंड: यह फंड साल 2025-26 से 2029-30 तक पांच सालों के लिए है। इसके तहत हर साल होनहार स्टार्टअप्स को 100 करोड़ से 250 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी दी जाएगी ताकि वे अपना काम बढ़ा सकें।
  • ₹500 करोड़ का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड (TAF): यह फंड नई तकनीकों को बाजार के लिए तैयार प्रोडक्ट में बदलने में मदद करता है। इसके तहत छोटे उद्योगों को प्रोजेक्ट की लागत का 60% तक और बड़ी कंपनियों को 40% तक की आर्थिक मदद दी जाती है।

FDI के आसान नियम और न्यूस्पेस इंडिया (NSIL) का बड़ा रोल

सरकार ने विदेशी निवेशकों को भारत की तरफ आकर्षित करने के लिए नियमों को बहुत आसान बना दिया है। नए नियमों के मुताबिक, अब बिना किसी सरकारी झंझट के (ऑटोमैटिक रूट से) विदेशी कंपनियां भारत के स्पेस सेक्टर में भारी निवेश कर सकती हैं:

  • सैटेलाइट बनाना और चलाना: इस काम में 74% तक का विदेशी निवेश सीधे तौर पर आ सकता है।
  • रॉकेट और स्पेसपोर्ट (लॉन्चिंग पैड) बनाना: इस क्षेत्र में 49% तक का विदेशी निवेश बिना किसी रुकावट के आ सकता है।
  • सैटेलाइट के पुर्जे बनाना: सैटेलाइट और ग्राउंड सिस्टम के पुर्जे बनाने वाली कंपनियों में अब पूरे 100% विदेशी निवेश की छूट सीधे ऑटोमैटिक रूट से दे दी गई है।

दूसरी तरफ, इसरो की कमर्शियल शाखा ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ (NSIL) भी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। NSIL का काम प्राइवेट कंपनियों को इसरो की तकनीक सौंपना और कमर्शियल सैटेलाइट्स को लॉन्च करना है। इस संस्था की कमाई में 10 गुना की भारी बढ़ोतरी हुई है। जुलाई 2026 तक NSIL ने कुल 141 सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनमें से 138 विदेशी ग्राहकों के हैं, जो यह साबित करता है कि दुनिया अब भारत की लॉन्चिंग कैपसिटी पर पूरा भरोसा करती है।

सरकारी नीतियों से जमीन पर दिखने लगा असली असर

सरकार के इन बड़े सुधारों का असर अब सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि हकीकत में आसमान में दिखने लगा है। इसकी शुरुआत अक्टूबर 2022 में हुई जब भारत ने एक साथ वनवेब के 36 सैटेलाइट लॉन्च किए। इसके बाद नवंबर 2022 में ‘विक्रम-एस’ नाम का देश का पहला प्राइवेट रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा गया। फिर मई 2024 में ‘अग्निकुल कॉस्मॉस’ नाम की प्राइवेट कंपनी ने श्रीहरिकोटा में बने देश के पहले निजी लॉन्च पैड ‘धनुष’ से अपना रॉकेट छोड़कर इतिहास रच दिया। इस रॉकेट में दुनिया का पहला ऐसा इंजन लगा था, जिसे 3D-प्रिंटर से एक ही टुकड़े में बनाया गया था।

यही नहीं, प्राइवेट कंपनियों की मदद के लिए फरवरी 2026 में 511 करोड़ रुपये का एक बड़ा समझौता हुआ, जिसके तहत सरकार की SSLV रॉकेट तकनीक को अगले 10 साल के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को ट्रांसफर कर दिया गया। वहीं ‘बेलैट्रिक्स एयरोस्पेस’ नाम की कंपनी ने पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाला एक ‘ग्रीन इंजन सिस्टम’ भी बनाकर दिखाया है। 

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First Published - July 18, 2026 | 1:43 PM IST

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