दुनिया की बेहतरीन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शुमार ‘ब्रह्मोस’ की मार अब और घातक होने वाली है। ब्रह्मोस मिसाइलों को और अधिक पैनापन देने के लिए इसके नए संस्करण पर काम चल रहा है। इस दमदार मिसाइल का नया अवतार अधिक लंबी दूरी तक निशाना साधने के साथ ही हल्का और दुश्मनों की नजर से बचने की अपनी अद्भुत क्षमता से लैस होगा।
ये नए संस्करण देश की सटीक हमले की क्षमता को और अधिक धार दे सकते हैं और साथ वैश्विक हथियारों के बाजार में देश की स्थिति मजबूत कर सकते हैं।
भारत और रूस के संयुक्त उद्यम के तहत बनी इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मारक क्षमता (रेंज) अब 450 किलोमीटर से अधिक है और इसे थलसेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल किया जा चुका है।
शुरुआत में इसे 290 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य साधने के लिए तैयार किया गया था मगर मिसाइल तकनीक नियंत्रण प्रणाली (एमटीसीआर) में भारत को पूर्ण सदस्यता मिलने के बाद इसकी मारक क्षमता बढ़ाई गई क्योंकि इससे इसकी रेंज पर लगी पाबंदियां समाप्त हो गई थीं।
ब्रह्मोस एरोस्पेस के मुख्य कार्याधिकारी एवं प्रबंध निदेशक जयतीर्थ आर जोशी ने कहा कि भारत-रूस का यह संयुक्त उद्यम अगली पीढ़ी के संस्करण पर काम कर रहा है जिनमें कॉम्पैक्ट ‘ब्रह्मोस-एनजी’ और भविष्य के लिए अधिक दूरी तक मार करने वाले संस्करण शामिल हैं।
जोशी ने नागपुर में सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से कहा,‘हम ब्रह्मोस-एनजी और अधिक मारक क्षमता वाले संस्करण पर काम कर रहे हैं। हम बहुत अधिक दूर तक मार करने की क्षमता तैयार करना चाहते हैं।’ यह कार्यक्रम स्वदेशी ब्रह्मोस बूस्टर की 100वीं आपूर्ति के मौके पर आयोजित किया गया था।
हालांकि, ऐसी अटकल है कि भविष्य के ब्रह्मोस संस्करण 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी के लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम हो सकते हैं मगर जोशी ने कहा कि इसकी नई मारक क्षमता को लेकर कुछ अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा, ‘हम इस पर विचार कर रहे हैं। यह अभी शुरुआती चरण में है।’
उम्मीद है कि अगली पीढ़ी की मिसाइल मौजूदा ब्रह्मोस (जिसका वजन लगभग 3 टन है) की तुलना में काफी छोटी और हल्की होगी। जोशी के मुताबिक इसकी नई डिजाइन में वज़न कम करने और हथियार अधिक बेहतर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए ‘एडवांस्ड कंपोजिट मटीरियल’ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ‘एडवांस्ड कम्पोजिट मटीरियल’ दो या दो से अधिक अलग-अलग सामग्री को मिलाकर तैयार एक उच्च-तकनीकी सामग्री है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि वजन कम होने से लड़ाकू विमान एक बार की उड़ान में अधिक मिसाइलें ले जा सकेंगे जिससे युद्ध में उनकी क्षमता काफी बढ़ जाएगी। उम्मीद है कि इस हल्के मिसाइल को भविष्य के लड़ाकू विमान और नौसेना सहित कई तरह के प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया जा सकेगा।
उन्होंने कहा, ‘ब्रह्मोस के भविष्य के संस्करण में बेहतर स्टेल्थ (दुश्मनों की नजर से बचने की खूबी) क्षमता, आधुनिक सामग्री और नए एवं आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली के खिलाफ अधिक ताकत जैसी खूबियां होगीं।’
मिसाइल का तकनीकी विकास स्वदेशीकरण की दिशा में एक बड़े कदम के साथ हो रहा है। जोशी ने कहा कि हाल के वर्षों में सबसे अहम उपलब्धियों में से एक महत्त्वपूर्ण पुर्जों का स्वदेशीकरण है जो पहले रूस से मंगाए जाते थे।
उन्होंने कहा,‘पहले हम रूस से बूस्टर आयात करते थे। वर्ष 2018 में सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड को तकनीक हस्तांतरित की गई और वर्ष 2022 से उत्पादन शुरू हो गया है।’
कंपनी ने हाल में 100वें स्वदेशी ब्रह्मोस बूस्टर की आपूर्ति की। उन्होंने आगे कहा,‘एक महीने में एक बूस्टर तैयार होने से अब क्षमता बढ़कर छह बूस्टर तक पहुंच गई है। सोलर इस बूस्टर के स्वदेशीकरण में अहम भूमिका निभा रही है।’
स्वदेशीकरण की कोशिश अब एक और महत्त्वपूर्ण पहलू (मिसाइल में विस्फोटक सामग्री) तक बढ़ाई जा रही है। हालांकि, सोलर इंडस्ट्रीज विस्फोटक सामग्री के लिए तकनीक हस्तांतरण प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरा करने वाली निजी क्षेत्र की पहली कंपनी बन गई है मगर कई कंपनियों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया है। जोशी ने कहा,‘अब तक विस्फोटक हथियार आयात किए जा रहे थे। अब वे स्थानीय स्तर पर तैयार होंगे।’
स्वदेशी सामग्री बढ़ने से लागत काफी होने की उम्मीद है। ब्रह्मोस एरोस्पेस ने विनिर्माण क्षमता बेहतर बनाने और उत्पादन प्रक्रिया के सुदृढ़ तरीके से इस्तेमाल के लिए पिछले 18 महीनों में एक व्यापक ‘वैल्यू-इंजीनियरिंग’ कार्यक्रम शुरू किया है। वैल्यू इंजीनियरिंग किसी उत्पाद या परियोजना का मूल्य बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाला एक व्यवस्थित तरीका है।
उन्होंने कहा, ‘वैल्यू इंजीनियरिंग से प्रक्रिया मजबूत बनाई गई है। वैकल्पिक तरीके अपनाए गए हैं। कच्चे माल पर लागत में लगभग 24 प्रतिशत कमी हुई है। पुर्जे एवं विनिर्माण पर लागत 10 प्रतिशत की कमी आई है।’ उन्होंने कहा कि अगले दो वर्षों में कुल लागत में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आने की उम्मीद है।
जोशी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को ब्रह्मोस के इतिहास में एक अहम मोड़ बताया। उन्होंने कहा कि इस मिसाइल का जमीन, समुद्र और हवा से कई बार परीक्षण किया जा चुका है मगर हाल में हुए सैन्य अभियान ने इस हथियार प्रणाली की वास्तविक हालात में कामयाबी साबित की है।
उन्होंने कहा,‘यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें हमने दुश्मन पर मिसाइल का परीक्षण किया और यह एक ऐसी कामयाबी की कहानी है जिसे पूरी दुनिया देख चुकी है।’