भारत में सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म होते ही बाजार में कम दाम वाली जेनेरिक दवाओं की होड़ बढ़ जाएगी। देश भर के चिकित्सकों ने भी कहा कि मरीजों की ओर से इस दवा के बारे में पूछताछ बढ़ गई है। इस दवा के बारे में केवल मधुमेह या पुराने मोटापे से पीड़ित लोग ही पूछताछ नहीं कर रहे हैं बल्कि स्वस्थ लोग जो सुंदर दिखने के लिए वजन घटाना चाहते हैं, उनकी ओर से भी पूछताछ में बढ़ोतरी हुई है।
चिकित्सकों का कहना है कि कीमत में कमी की उम्मीद से लोगों की इस दवा में दिलचस्पी बढ़ी है। साथ ही सोशल मीडिया पर चर्चा और प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा प्रचार से भी लोग इस दवा के बारे में जानना चाह रहे हैं।
मुंबई के एक वरिष्ठ चिकित्सक राजीव कोविल ने कहा, ‘इस दवा को लिखने के लिए उचित चिकित्सकीय मापदंड हैं और यह शौकिया वजन घटाने के लिए नहीं है।’ उन्होंने बताया कि जिन मरीजों को मधुमेह नहीं है, उन्हें इस उपचार के लिए योग्य होने की खातिर मोटापे से जुड़ी अन्य समस्याओं के साथ-साथ बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के तय मानकों को भी पूरा करना होगा। उन्होंने कहा कि इस थेरेपी को महज वजन घटाने का आसान तरीका मान लेना इसके व्यापक महत्त्व को कम करता है जबकि असल में यह एक ऐसा उपचार है जो हृदय, यकृत और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में अहम भूमिका निभाती है।
कई चिकित्सकों का कहना है कि उन्हें ऐसे मरीजों को लौटाना पड़ रहा है जो चिकित्सकीय तौर पर इस उपचार के योग्य नहीं हैं। अपर्णा गोविल भास्कर ने कहा कि उनके क्लीनिक में ऐसे लोगों की पूछताछ बढ़ी है जिनका वजन पहले से ही दुरुस्त है लेकिन वे वजन और कम करना चाहते हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘यह ऐसी चीज नहीं है जिसे आप इंस्टाग्राम पर देखकर या किसी सेलिब्रेटी को इसके बारे में बात करते सुनकर अपना लें। इसके कुछ खास संकेत और संभावित दुष्प्रभाव होते हैं, जिनमें से कुछ गंभीर भी हो सकते हैं।’ भास्कर ने आगाह किया कि बिना किसी की देखरेख के इसका इस्तेमाल करने से प्रतिकूल परिणाम और अप्रत्याशित दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है शारीरिक जोखिमों के अलावा यह प्रवृत्ति गहरी मनोवैज्ञानिक चिंताओं को भी दर्शाती है। वजन घटाने का अत्यधिक या चिकित्सकीय रूप से अस्वास्थ्यकर लक्ष्य रखने वाले व्यक्तियों की ओर से इस दवा के बारे में पूछताछ अक्सर बॉडी इमेज (अपने शरीर के प्रति सोच) से जुड़ी उन समस्याओं की ओर इशारा करता है, जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता।’
आसानी से उपलब्ध होने और नियमों का सख्ती से पालन नहीं होने से यह चिंता और भी बढ़ जाती है। हालांकि यह दवा चिकित्सक के पर्चे पर ही मिलती है लेकिन चिकित्सकों ने आगाह किया कि मरीज बिना किसी उचित निगरानी के भी इसे हासिल करने के तरीके ढूंढ़ सकते हैं।
कोविल ने कहा, ‘जब सामर्थ्य बढ़ती है तो पहुंच लक्षित रोगी समूह से इतर बढ़ जाती है जिससे दुरुपयोग का खतरा रहता है।’ उन्होंने सख्त विनियमन की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि नुस्खों में चिकित्सीय संकेत स्पष्ट रूप से लिखे हों और खुराक का सख्ती से पालन किया जाए।
विशेषज्ञों ने आपूर्ति में गड़बड़ी के जोखिम को भी उजागर किया, जहां गैर-उपचारात्मक मांग में वृद्धि से उन रोगियों के लिए दवा की उपलब्धता सीमित हो सकती है जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। साथ ही ऑनलाइन गलत सूचनाओं के कारण अनुचित खुराक से पाचन संबंधी समस्याओं से लेकर पित्ताशय की बीमारी या मेटाबॉलिक संबंधी गड़बड़ी जैसी अधिक गंभीर स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
इस बीच, जेनेरिक दवाओं के आने से पूरे बाजार का व्यापक विस्तार होने की उम्मीद है। एक अन्य चिकित्सक सुखविंदर सिंह सग्गू ने कहा कि दवाओं के ज्यादा किफायती होने से पात्र मरीजों तक उनकी पहुंच बेहतर होगी और चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली पर्चियों की संख्या में भी बढ़ोतरी होने की संभावना है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भले ही कीमतों को लेकर होड़ कितना भी बढ़ जाए, उपचार से जुड़े फैसले हमेशा दवाओं के असर, सुरक्षा और मरीज की चिकित्सकीय जरूरत पर ही आधारित रहेंगे।