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रसोई गैस पर मंडराया संकट, आयात घटा और स्टॉक कम; अप्रैल में बढ़ सकती है परेशानी

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देश में रसोई गैस ग्राहकों के सिलिंडर देर में बुक किए जा रहे हैं। कमर्शियल -औद्योगिक ग्राहकों को कम गैस दी जा रही है। लेकिन गैस की किल्लत से निपटने के लिए यह शायद नाकाफी होगा।

Last Updated- March 18, 2026 | 10:36 PM IST
lpg cylinder

शिवालिक और नंदा देवी बरसों तक चकाचौंध से दूर खामोशी के साथ समंदर की लहरों पर तैरते आ रहे थे। ये दोनों भारत में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के दो सबसे बड़े टैंकर हैं, जो चुपचाप अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहे थे। मगर पश्चिम एशिया में टकराव के कारण पेट्रोलियम की किल्लत होते ही राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया ने गुजरात में मुंद्रा बंदरगाह पर नजर टिका दी। इसके साथ ही इन टैंकरों की हर हलचल सुर्खियों में आने लगी। एलपीजी ढोकर लाने वाले जहाज शिवालिक ने सोमवार को मुंद्रा पर लंगर डाला और दूसरा एलपीजी टैंकर नंदा देवी मंगलवार तड़के गुजरात के ही कांडला बंदरगाह पर पहुंचा। दोनों जहाजों में करीब 92-92 हजार टन प्रोपेन और ब्यूटेन है। मगर इन्हें आपस में मिलाने के बाद बनी एलपीजी देश के घरों की एक दिन की मांग ही पूरी कर पाएगी।

जहाजों पर नजर रखने वालों से मिले आंकड़े बहुत चौंकाने वाले हैं, जिन्हें उद्योग के अधिकारियों ने भी सही बताया है। भारत को सालाना 3.3 करोड़ टन एलपीजी की जरूरत होती है और इसका 65 फीसदी पूरा करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े टैंकरों को कम से कम 500 बार गैस भरकर यहां लानी पड़ेगी। रिफाइनिंग अधिकारियों ने कहा कि दूसरे स्थानों से एलपीजी तलाशी जा रही है मगर वह भारतीय घरों की कुल जरूरत से बहुत कम रहेगी।

सिंगापुर में ऊर्जा विशेषज्ञ वंदना हरि ने कहा कि खाड़ी से बाहर एलपीजी मिल भी गई तो उसे भारत तक पहुंचने में बहुत समय लग जाएगा। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक अधिकारी ने हाल में संवाददाताओं के सामने कबूल किया कि एलपीजी चिंता का सबब है मगर उन्होंने विस्तार से कुछ नहीं बताया। बिज़नेस स्टैंडर्ड का विश्लेषण बताता है कि अप्रैल कितना भारी पड़ सकता है। एलपीजी का स्टॉक घट रहा है और गैस की आवक बहुत कम है। इसलिए भारत अगले महीने कम से कम एक पखवाड़े की खपत के लिए जरूरी गैस विदेश से इकट्ठी करने के लिए जूझ रहा है।

देश में रसोई गैस ग्राहकों के सिलिंडर देर में बुक किए जा रहे हैं और कमर्शियल तथा औद्योगिक ग्राहकों को कम गैस दी जा रही है। लेकिन गैस की किल्लत से निपटने के लिए यह शायद नाकाफी होगा।

शिपिंग के आंकडों और उद्योग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि एलपीजी की आवक में तेज गिरावट चिंता बढ़ा रही है। कच्चे तेल या तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के उलट ज्यादातर एलपीजी के लिए दुनिया भर में लंबी अवधि के करार किए जाते हैं। इसलिए हाजिर बाजार के लिए बहुत कम एलपीजी बचती है। आंकड़े बता रहे हैं कि मार्च के पहले 15 दिनों में केवल 5.61 लाख बैरल रोजाना एलपीजी आई, जो फरवरी के पहले 15 दिनों के मुकाबले 36 फीसदी कम है। मार्च में जो गैस आई है, वह भी 28 फरवरी के पहले लादी गई थी, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला नहीं किया था।

केप्लर और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मार्च और अप्रैल में भारत भेजने के लिए रोजाना केवल 2.19 लाख बैरल एलपीजी लादी जा रही है, जो फरवरी के लदान से 75 फीसदी कम है। इससे देश में बमुश्किल तीन दिन की मांग पूरी हो पाएगी। इसमें भी आधी से ज्यादा एलपीजी अमेरिका से चार टैंकरों में आ रही है, जो 40-50 दिन सफर कर अप्रैल में ही यहां पहुंच पाएगी। पश्चिम एशिया से गैस आने में 7 से 14 दिन ही लगते हैं।

अमेरिका से इस महीने 1.22 लाख बैरल रोजाना गैस ही लादी गई है और फिलहाल इकलौती वही गैस भारत आ रही है। मार्च की बाकी खेप में 6 टैंकर हैं, जो फारस की खाड़ी में फंसे हैं और जिनकी वजह से एलपीजी की आपूर्ति घटी है। नौवहन मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि भारत ने इन टैंकरों को महफूज रास्ता दिलाने के लिए ईरान के साथ राजनयिक प्रयास तेज कर दिए हैं।

नए ठेके भी कम ही दिख रहे हैं। सरकारी तेल कंपनियों ने गैस खरीदने के लिए इस महीने केवल तीन निविदा जारी कीं। ये निविदा कुल 80,000 टन से भी कम गैस की हैं, जो एक दिन के लिए भी काफी नहीं होगी। आर्गस के अनुसारमार्च से दिसंबर तक हर महीने 20,000 टन एलपीजी की एक निविदा 25 फरवरी को जारी की गई और बिना ठेका दिए 3 मार्च को बंद हो गई। एक अन्य तेल मार्केटिंग कंपनी ने मार्च-अप्रैल के लिए 46,000 टन गैस का करार कर लिया है मगर उसे करीब 350 डॉलर प्रति टन ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है, जो अप्रैल के सऊदी अनुबंध की कीमत से 65 फीसदी ज्यादा है। अप्रैल सऊदी अनुबंध 570-580 डॉलर प्रति टन पर चल रहा है।

हाजिर बाजार में सीमित विकल्प

शिपिंग और निविदा के आंकड़े बताते हैं कि भारत जो एलपीजी आयात कर रहा है, वह अप्रैल में केवल 4-5 दिन चल पाएगी, जबकि आम दिनों में 20 दिन की एलपीजी रखी जाती है। महीने भर में जितनी एलपीजी की जरूरत होती है, उसके हिसाब से देश में बनने वाली एलपीजी केवल 10 दिन चल सकती है। सरकार ने देसी उत्पादन 28 फीसदी बढ़ने की बात कही है मगर रिफाइनरी विशेषज्ञों के मुताबिक वृद्धि काफी कम है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार आपूर्ति जितनी कम हुई है, मांग उतनी ही बढ़ गई है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जनवरी के बीच एलपीजी की खपत करीब 8 फीसदी बढ़कर 2.8 करोड़ टन हो गई। इसकी बड़ी वजह औद्योगिक मांग और गांवों में खपत बढ़ना है। अब दाम बड़ा मसला नहीं रह गया है। असली मसला गैस की उपलब्धता है।

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी निर्यातक है और 2025 में उसने 23 लाख बैरल रोजाना निर्यात किया था। इसके बाद भी उसके पास इतनी गैस बची थी कि वह रोजाना 4.5 लाख बैरल निर्यात और कर सकता था। लेकिन लंदन की स्पार्टा के अनुसार वहां से एशिया तक गैस लाने में करीब छह हफ्ते लग जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा, ‘पश्चिम एशिया में युद्ध से आपूर्ति में जो रुकावट आई है, वैसी रुकावट दुनिया के तेल बाजार में पहले कभी नहीं देखी गई थी।’ उसका अनुमान है कि मार्च में समूचे पश्चिम एशिया में करीब 79 लाख बैरल रोजाना कच्चे तेल और 99 लाख बैरल रोजाना तरल की आपूर्ति बंद हो सकती है। खाड़ी के उत्पादकों ने 2025 में होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते करीब 15 लाख बैरल रोजाना एलपीजी का निर्यात किया।

स्पार्टा कमोडिटीज के सीईओ फिलिप ईलिंक शूर्मैन ने कहा, ‘कच्चे तेल के आंकड़े गंभीर हैं मगर उत्पादकों की स्थिति और भी खराब है।’एलपीजी आपूर्ति के लिए खाड़ी में रिफाइनिंग बहुत जरूरी है मगर हमलों और बंद निर्यात रास्तों की वजह से इसमें से 30 लाख बैरल रोजाना क्षमता पहले ही बंद हो चुकी है।

केप्लर के अनुसार पिछले रास्ते भारत में होर्मुज के रास्ते रोजाना 6.78 लाख बैरल रोजाना एलपीजी आई थी, जो देश के कुल गैस आयात की 90 फीसदी और कुल खपत की 64 फीसदी थी। संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुवैत सहित भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं ने उत्पादन क्षेत्र या प्रमुख रिफाइनरी बंद कर दी हैं। कतर ने अप्रत्याशित घटना का हवाला देते हुए 2 मार्च को एलएनजी और एलपीजी उत्पादन रोक दिया, जिससे भारत को मिलने वाली करीब गैस में 20 फीसदी कमी आ गई। होर्मुज के रास्ते टैंकरों की आवाजाही ठप हो गई है, जिससे रोजाना करीब 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल और 50 लाख टन परिशोधित उत्पाद गुजरते हैं।

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First Published - March 18, 2026 | 10:30 PM IST

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