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UPI का प्रभाव: डिजिटल भुगतान के बढ़ते चलन से भारत में ATM का जाल धीरे-धीरे सिमट रहा है

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कम नकदी निकालने का बढ़ता रुझान और डिजिटल भुगतान की बढ़ती प्राथमिकता के कारण एटीएम संचालन की आर्थिक व्यवहार्यता और भी जटिल हो गई है।

Last Updated- May 26, 2025 | 10:51 PM IST
ATM
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

राम सेवक अब अपना ज्यादातर छोटा-मोटा लेनदेन यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई से ही करते हैं लेकिन जब बात मजदूरी देने की आती है तो उन्हें नकद पैसे की जरूरत महसूस होती है। गन्ना किसान 42 साल के सेवक कहते हैं कि अब ऐसे एटीएम ढूंढना मुश्किल हो गया है जो ठीक चल रहे हों या उनमें पर्याप्त पैसे हों। नकद पैसे निकाने के लिए उन्हें काफी दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। सेवक अकेले नहीं हैं, जिन्हें इस तरह की परेशानी से दो-चार होना पड़ रहा है। इस संवाददाता ने भी दिल्ली-एनसीआर के बाहरी इलाकों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर और मेरठ जैसे कुछ इलाकों में घूमकर तमाम एटीएम की स्थिति का जायजा लिया। हकीकत वैसी ही दिखती है, जैसी राम सेवक बताते हैं। 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, एक साल के भीतर देश में लगभग 2000 एटीएम कम हो गए हैं।  वर्ष 2023 में पूरे देश में 255,000 एटीएम थे, लेकिन मार्च 2024 के अंत तक यह संख्या घटकर 253,000 हो गई। सरकारी बैंकों के ऑनसाइट और ऑफसाइट दोनों तरह के एटीएम का दायरा कम हुआ है। ऑनसाइट एटीएम वर्ष 2023 के 78,777 से घटकर वर्ष 2024 में 77,033 रह गए हैं, जबकि ऑफसाइट एटीएम 59,646 से घटकर 57,661 पर आ गए।

 निजी बैंकों ने अपने ऑनसाइट एटीएम की संख्या 41,426 से बढ़ाकर 45,438 कर दी है, लेकिन उनके ऑफसाइट एटीएम घटकर 35,549 से 34,446 रह गए हैं। विदेशी बैंकों ने इस लिहाज से मामूली बदलाव दर्ज किया है, जबकि लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) ने अपने कुल एटीएम की संख्या 2,821 से बढ़ाकर 3,068 कर दी है। जहां तक पेमेंट बैंकों की बात है तो उन्होंने अपने सभी एटीएम बंद कर दिए हैं। व्हाइट लेबल एटीएम (डब्ल्यूएलए) की संख्या भी वर्ष 2023 के 35,791 से घटकर वर्ष 2024 में 34,602 रह गई है। इस प्रकार के एटीएम ज्यादातर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में होते हैं।

विस्तार की थमी रफ्तार

रियल एस्टेट लागत, नकदी प्रबंधन, नियमित रखरखाव और सॉफ्टवेयर अपग्रेड आदि खर्च मिलाकर कुल परिचालन लागत बढ़ने के कारण एटीएम का विस्तार कम हो गया है।  एक वरिष्ठ बैंकर ने बताया कि कस्बाई क्षेत्रों में अकेले एटीएम की परिचालन लागत कम से कम 40,000 रुपये और शहरों में 60,000 रुपये तक आती है। बैंकर ने कहा, ‘यदि रोजाना का लेनदेन का आंकड़ा 100 तक भी नहीं पहुंचता है तो फिर इसे चलाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है।’

कम नकदी निकालने का बढ़ता रुझान और डिजिटल भुगतान की बढ़ती प्राथमिकता के कारण एटीएम संचालन की आर्थिक व्यवहार्यता और भी जटिल हो गई है।

कैपिटल स्मॉल फाइनैंस बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ सर्वजीत सिंह समरा ने एटीएम की चुनौती के बारे में खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के संदर्भ में विस्तार से बताया है। उन्होंने कहा, ‘हाल के वर्षों में ग्राहकों की संख्या निश्चित रूप से कम हुई है। चूंकि हमारी उपस्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है, ऐसे में लागत का प्रबंधन महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि हमारे अधिकांश एटीएम अलग इकाइयों के रूप में काम करने के बजाय बैंक शाखाओं से ही जुड़े हैं।’

ग्राहकों की घटती संख्या बैंकों की कमाई में भी दिखती है। उदाहरण के तौर पर भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एटीएम लेनदेन से शुद्ध आमदनी वित्त वर्ष 2023 में 435 करोड़ रुपये से घटकर वित्त वर्ष 2024 में 331 करोड़ रुपये रह गई, जो लगभग 24 प्रतिशत गिरावट को दर्शाता है। इसी तरह, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूबीआई) को एटीएम लेनदेन से होने वाला नुकसान इसी अवधि के दौरान 195.88 करोड़ रुपये से बढ़कर 203.87 करोड़ रुपये हो गया। 

एक सरकारी बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने माना कि डिजिटल लेनदेन का बढ़ता दायरा और रखरखाव की बढ़ती लागत को देखते हुए अधिकांश बैंक अब अपने एटीएम नेटवर्क का विस्तार करने के इच्छुक नहीं हैं। 

पंजाब नैशनल बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ अशोक चंद्रा ने उपभोक्ताओं की बदलती आदतों के बारे में कहा, ‘आजकल, अधिकांश ग्राहक अपने घर से ही लेनदेन करना पसंद करते हैं। हम अपने मौजूदा एटीएम ढांचे को बनाए रख रहे हैं, लेकिन ग्राहकों की संख्या निश्चित रूप से कम हुई है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में प्रति एटीएम रोजाना औसतन लगभग 100 लेनदेन होते हैं। कुछ क्षेत्रों में यह और भी कम है यानी रोजाना 50 से 100 के बीच। इतने सीमित इस्तेमाल के आधार पर इसका संचालन करना मुश्किल है।’ चंद्रा ने कहा कि वर्ष 2019 में महामारी से पहले के स्तर की तुलना में यह गिरावट विशेष रूप से महानगरों और छोटे शहरों या कस्बाई क्षेत्रों में तेजी से आई है। उन्होंने कहा कि नई शाखाओं में लगाए जाने वाले एटीएम को छोड़ दें तो पीएनबी ने पिछले एक साल में कोई नया एटीएम नहीं लगाया है। 

आरबीआई के आंकड़ों से एटीएम पहुंच में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानताएं भी दिखती हैं। मार्च 2024 के अंत तक सभी एटीएम में सरकारी बैंकों और निजी बैंकों की हिस्सेदारी क्रमशः 61.6 प्रतिशत और 36.5 प्रतिशत थी। महानगरों में दोनों क्षेत्रों के बीच वितरण लगभग समान था। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में 78.7 प्रतिशत एटीएम सरकारी बैंकों के हैं, जबकि ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में अधिकांश मशीनें व्हाइट लेबल श्रेणी की थीं, जो 83.9 प्रतिशत से अधिक हैं।

फरवरी 2024 तक देश भर में 92,000 ऑफसाइट एटीएम दर्ज किए गए जो वर्ष 2023 में 95,000 थे। ऐक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया जैसे देश के कुछ सबसे बड़े बैंकों ने बढ़ती लागत और कम रिटर्न का हवाला देते हुए अपने ऑफसाइट एटीएम की संख्या कम कर दी है।

एटीएम की दास्तां

वर्ष 1987 में शुरुआत के साथ ही एटीएम ने बैंकिंग क्षेत्र में क्रांति ला दी, क्योंकि इसने लेनदेन को बहुत आसान बना दिया। मिलेनियल्स (1980 के दशक के शुरुआती दौर और 1990 के दशक के मध्य तक जन्मे लोग) के लिए एटीएम से पैसे निकालना आदत बन गई थी। जेन जेड पीढ़ी इन मशीनों के साथ ही बड़ी हुई और ये उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा थीं। लेकिन अब, जैसे-जैसे नई पीढ़ी वयस्क हो रही है, एटीएम उतने आम या भरोसेमंद नहीं रह गए हैं।

गाजियाबाद के एक बाजार में एक दुकानदार कहते हैं, ‘हमारे लिए एटीएम खासतौर पर सप्ताहांत में बेहद उपयोगी हुआ करते थे। बैंक बंद होने पर वे ही एकमात्र सहारा थे, लेकिन पिछले लगभग एक साल से या तो एटीएम मिलता नहीं और यदि मिले भी तो उसमें पैसे नहीं होते हैं।’

यहां तक कि गांवों में जहां कभी डिजिटल साक्षरता बड़ी बाधा थी, वहां भी अब स्मार्टफोन और क्यूआर कोड का खूब इस्तेमाल किया जाता है।  नोएडा के एक 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर डेवलपर प्रतीक शुक्ला ने कहा, ‘इन दिनों हम रात में अक्सर देखते हैं कि एटीएम बंद हैं, जबकि पहले इन्हें आपात स्थिति में एक विश्वसनीय विकल्प माना जाता था। यूपीआई के कारण इनकी अहमियत जरूर घट गई है, लेकिन अन्य कारकों ने भी हम जैसे लोगों के लिए इसके महत्त्व को बढ़ाने में भूमिका निभाई है।’ विश्लेषकों के अनुसार, भले एटीएम कम हो जाएं, लेकिन विशेषकर नकद लेनदेन के लिए इनकी आवश्यकता बनी रहेगी। 

आगे की राह

एटीएम संचालन के लिए बैंकों के समक्ष खड़ी चुनौती को कम करने के लिए आरबीआई ने अनिवार्य मुफ्त लेनदेन के बाद प्रत्येक लेनदेन पर शुल्क 21 रुपये से बढ़ाकर 23 रुपये कर दिया है, जो 1 मई से प्रभावी है। आरबीआई के पूर्व कार्यकारी निदेशक चंदन सिन्हा ने कहा कि बड़े और लघु दोनों बैंकों के लिए अपने एटीएम कारोबार को आउटसोर्स करना बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा,‘कम मांग वाले क्षेत्रों से एटीएम हटाकर व्यस्त इलाकों में लगाए जा सकते हैं। बैंक इनके नियमित अपग्रेड, नकदी प्रबंधन और सॉफ्टवेयर रखरखाव जैसे काम भी आउटसोर्स कर सकते हैं।’ 

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First Published - May 26, 2025 | 10:31 PM IST

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