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क्या गड़बड़ी के गड्ढे भर पाएगी नई मनरेगा? 1 जुलाई से ‘वीबी जीरामजी’ योजना होगी लागू, बैठकों का दौर शुरू

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वीबी जी राम जी आवंटन-आधारित योजना है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 अनुपात में धन-आवंटन व्यवस्था है

Last Updated- June 29, 2026 | 11:04 PM IST
women labour
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो: PTI

ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मनरेगा में व्यापक स्तर पर गड़बड़ी एवं अनियमितताओं के कारण ही इसमें बदलाव किया गया है। उन्होंने कहा, ‘मैंने दो वर्षों तक लगातार मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का अध्ययन किया और पाया कि इस योजना में कई गंभीर विसंगतियां आ गई हैं। बड़े पैमाने पर धन का दुरुपयोग हो रहा है। मस्टर रोल ठीक से नहीं बनाए गए और श्रमिकों की उपस्थिति में हेरफेर किया गया। इन तमाम गड़बडि़यों को देखते हुए हमने इसे विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार ऐंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी जीरामजी के रूप में लाने के बारे में फैसला लिया।’

नई दिल्ली में रविवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय ग्रामीण विकास सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि जब वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब भी उन्होंने पाया कि मनरेगा कानून अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर रहा था। इसलिए यह समय की मांग थी कि वीबी जी राम जी को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। देश की सबसे पुरानी ग्रामीण रोजगार योजनाओं में शुमार मनरेगा 1 जुलाई को समाप्त हो रही है। ऐसे में इस योजना के आलोचक और समर्थक दोनों ही वीबी जी राम जी के प्रदर्शन पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।

नई मनरेगा को लागू करने के लिए सरकार ने विस्तृत योजना तैयार की है। इसने पूरे देश में योजना की निगरानी के लिए जिलों और तालुक स्तर पर 100 से अधिक अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मनरेगा श्रमिकों को नई योजना में शामिल होने में कोई कठिनाई न हो।

इससे पहले इसने भारत की 2,86,000 से अधिक ग्राम पंचायतों को निर्देश दिया था कि वे श्रमिकों को योजना की बारीकियों और जटिलताओं को समझाने के लिए विशेष बैठकें आयोजित करें। इसके अतिरिक्त, इसने कुछ सप्ताह पहले राज्यों को लगभग 95,692 करोड़ रुपये का अंतरिम आवंटन किया है।

देश की ग्रामीण रोजगार योजनाओं के लंबे इतिहास में नई मनरेगा एक और मील का पत्थर है। पुराने रिकॉर्ड के अनुसार गांवों में रोजगार से जुड़ी पहली योजना तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) से शुरू हुई थी, जब 1965 के अंत तक 1,000 सामुदायिक ब्लॉकों में रोजगार प्रदान करने के लिए ग्रामीण मानवशक्ति कार्यक्रम शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम नए-नए तरीके से आगे बढ़ते हुए अंततः 2005 में नरेगा अधिनियमन के रूप में लागू हुआ, जिसे बाद में मनरेगा का नाम दिया गया।

अपनी शुरुआत के बाद से मनरेगा ने भारत के ग्रामीण रोजगार परिदृश्य में अहम योगदान दिया है, जिसे नवीनतम आर्थिक समीक्षा में भी स्वीकार किया गया है। हालांकि, आ​र्थिक समीक्षा में कहा गया है कि समय के साथ बढ़ती आय, आवाजाही में सुधार, व्यापक डिजिटलीकरण और आजीविका के बढ़ते अवसरों ने ग्रामीण रोजगार परिदृश्य को बदल दिया। इससे मनरेगा कार्यक्रम की उपलब्धियों, डिजाइन और उद्देश्यों का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता महसूस की गई।

लेकिन, वीबी जी राम जी कानून यानी नई मनरेगा भी आलोचनाओं से अछूती नहीं है। कई विशेषज्ञों ने शुरुआत से पहले ही इसकी प्रकृति और धन पैटर्न पर सवाल उठाए हैं। इसमें राज्यों पर अ​धिक वित्तीय बोझ डालने की ​शिकायत सबसे अ​धिक है।

कांग्रेस ने दावा किया कि कई राज्यों, जिनमें भाजपा शासित मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड शामिल हैं, ने वीबी जी राम जी को लेकर चिंता जताई है क्योंकि नया कानून केवल केंद्रीकरण की गारंटी देगा और उनके लिए वित्तीय चिंता बढ़ाएगा। मनरेगा संघर्ष मोर्चा के सदस्य निखिल डे ने हाल ही में कहा, ‘पुरानी मनरेगा के उलट नया कानून श्रमिकों के लिए गारंटीकृत रोजगार को समाप्त कर देगा।

मनरेगा जहां मांग-आधारित थी और 15 दिनों के भीतर काम पाने का अधिकार उसमें था तथा श्रमिकों को न्यूनतम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी थी। इसके विपरीत, वीबी जी राम जी आवंटन-आधारित योजना है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 अनुपात में धन-आवंटन व्यवस्था है। इसका मतलब है कि यदि राज्य सरकार अपने हिस्से का धन जारी नहीं करेगी, तो श्रमिकों को काम की कमी का सामना करना पड़ेगा।’

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First Published - June 29, 2026 | 10:45 PM IST

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