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Middle East Crisis: पश्चिम एशिया युद्ध का भारत पर कितना असर? अर्थशास्त्रियों ने दिया बड़ा संकेत

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पश्चिम एशिया का टकराव कम समय तक रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर सीमित रहेगा, लेकिन तेल की ऊंची कीमतें जोखिम बढ़ा सकती हैं।

Last Updated- March 14, 2026 | 9:07 AM IST
Indian Economy
Representative Image

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में टकराव कम समय तक रहता है तो भारत के वृहद आर्थिक तस्वीर पर केवल सीमित असर पड़ने की संभावना है और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपनी लंबे समय तक नीतिगत दरें कम रखने की नीति पर कायम रहेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो जोखिम पैदा हो सकते हैं।

पिछले महीने जब इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ा तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, हालांकि बाद में घटकर 100 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। युद्ध शुरू होने से पहले कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे थीं।

स्टैंडर्ड चार्टर्ड के अर्थशास्त्रियों ने एक नोट में कहा, ‘हमारे विचार से पश्चिम एशिया में कम अवधि तक चलने वाले युद्ध का भारत की व्यापक अर्थव्यवस्था पर बहुत कम असर पड़ने की संभावना है।’

ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट बंद करने की धमकी दी है, जिसका मकसद तेल व गैस की आवाजाही बाधित करना है। सऊदी अरब, यूएई, इराक, कतर और कुवैत से भारत को होने वाला आयात हॉर्मुज स्ट्रेट से होता है। यह भारत के कुल तेल आयात का 46 प्रतिशत और कुल एलएनजी आयात का 54 प्रतिशत है।

बार्कलेज ने कहा है, ‘ऊर्जा की मौजूदा कीमतों का महंगाई पर सीमित असर पड़ने की संभावना है। ऐसे में मौद्रिक नीति में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। हमारा मानना है कि रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति 2026 में यथास्थिति बरकरार रखेगी।’

हालांकि अर्थशास्त्रियों ने आगाह किया कि अगर तेल की कीमतें 90 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में लगातार बनी रहती हैं, तो भारत को दबाव का सामना करना पड़ सकता है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें 90से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहती हैं, तो भारत का चालू खाते का घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 2.5 प्रतिशत हो सकता है, जो मौजूदा अनुमानों का लगभग 2.5 गुना है। हालांकि अगर कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तरों (लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल) से नीचे आती हैं और 2026 की चौथी तिमाही तक संघर्ष के पहले के स्तर पर लौट आती हैं, तो इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव मामूली ही रहेगा।

सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर बने रहने के लिए विवेकाधीन व्यय और पूंजीगत आवंटन कम कर सकती है। कम उत्पाद शुल्क संग्रह के अलावा ईंधन और उर्वरक सब्सिडी पर अधिक व्यय व सरकारी कंपनियों से कम लाभांश आय का भी असर पड़ सकता है।

येस बैंक ने एक नोट में कहा, ‘घरेलू महंगाई पर असर इस बात पर निर्भर है कि संघर्ष कितने समय तक चलता है और सरकार कितने समय तक पेट्रोल व डीजल की कीमतें रोके रख सकती है। हमारा मूल अनुमान यह है कि यदि यह संकट जारी रहता है, तो सरकार इस दबाव का अधिकांश हिस्सा राजकोषीय ढांचे के भीतर ही वहन कर लेगी।’

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि अस्थायी रहती है और इसका अधिकांश दबाव तेल विपणन कंपनियों तथा सरकार द्वारा वहन कर लिया जाता है, तो महंगाई काबू में रहेगी। अगर यह माना जाए कि संघर्ष कम चलेगा और डीजल पेट्रोल व गैस की कीमत में कोई बदलाव नहीं होगा तो वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई का औसत 4.1 प्रतिशत रह सकता है।

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First Published - March 14, 2026 | 9:07 AM IST

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