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सरकार ने जीडीपी मापने की पद्धति में बड़े बदलाव करते हुए नया आधार वर्ष और डबल डिफ्लेशन जैसी तकनीक अपनाई है, जिससे वृद्धि दर के आंकड़ों में संशोधन हुआ है।

Last Updated- February 28, 2026 | 11:04 AM IST
GDP
Representative Image

सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और संबंधित आंकड़ों को मापने के लिए नए तरीके अपनाए हैं। पहले की एकल मूल्य सूचकांक (डिफ्लेटर)  पद्धति से जुड़ी आलोचनाओं के बाद यह कदम उठाया गया है क्योंकि इससे उत्पादन और खर्च के आंकड़ों में फर्क आ रहा था।

यह बदलाव सिर्फ आधार वर्ष को 2011-12 से 2022-23 में बदलने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें कई सुधार किए गए हैं। अब कृषि और उद्योगों में दोहरी मुद्रास्फीति गिरावट (डबल डिफ्लेशन) को अपनाया जाएगा, वहीं असंगठित क्षेत्र के आंकड़े बढ़ाने के लिए, असंगिठत क्षेत्र के उद्यमों का एक सालाना सर्वेक्षण का इस्तेमाल होगा, श्रम की जानकारी के लिए नई श्रमिक सर्वेक्षण का डेटा लिया जाएगा और जीएसटी तथा अन्य सरकारी आंकड़ों का अधिक उपयोग किया जाएगा। साथ ही, उत्पादन और खर्च के आंकड़ों को बेहतर तरीके से जोड़ने के लिए नया ढांचा सप्लाई यूज टेबल (एसयूटी) ढांचा तैयार किया जाएगा।

अधिकारियों का कहना है कि इन बदलावों से अर्थव्यवस्था में हो रहे बड़े बदलावों को ठीक से मापा जा सकेगा, मूल्य सूचकांक के आंकड़े ठीक होंगे और जीडीपी के दोनों पक्षों के बीच जो फर्क था, वह कम होगा। हालांकि, नए आंकड़ों के हिसाब से भी वर्ष 2023-24 में वास्तविक जीडीपी में 0.4 प्रतिशत और 2024-25 में 1.2 प्रतिशत का फर्क रहेगा। हालांकि, यह पहले के आंकड़ों से कम है, जहां वर्ष 2011-12 के आधार पर ये फर्क 0.8 प्रतिशत और (-) 1.6 प्रतिशत था। नए आंकड़ों में वर्तमान कीमतों पर फर्क थोड़ा कम है। पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा कि हालांकि एसयूटी ढांचे का उपयोग सैद्धांतिक रूप से उत्पादन और खर्च पक्षों के अनुमान के बीच असंगति को खत्म करने के लिए करना चाहिए लेकिन फिर भी कुछ अंतर बना हुआ है।

उन्होंने कहा, ‘जब आप एसयूटी के माध्यम से खातों को पूरी तरह से एकीकृत कर लेते हैं तब तकनीकी रूप से कोई असंगति नहीं होनी चाहिए। फिर भी असंगति बने रहने का मतलब है कि अब भी कुछ माप से संबंधित समस्याएं हल नहीं हुई हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि नए आंकड़ों में सबसे महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत बदलाव दोहरे मूल्य समायोजन को अपनाना है। उन्होंने कहा, ‘डबल डिफ्लेटर की ओर यह बदलाव एक बहुत महत्त्वपूर्ण सुधार है।’

हालांकि यह पद्धति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी जानी-मानी जाती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह बदलाव भारत के मामलों में कैसे प्रभाव डालेगा। उन्होंने कहा, ‘हमें अभी तक यह नहीं पता है कि वृद्धि दरों में जो संशोधन हो रहा है, उसमें से कितना हिस्सा विशेष रूप से दोहरे मूल्य समायोजन की पद्धति से आ रहा है।’

एक और महत्त्वपूर्ण बदलाव यह है कि विनिर्माण और सेवा गतिविधियों का बेहतर विभाजन किया गया है, खासतौर पर कई गतिविधियों वाले उद्यमों में। नई सीरीज विभिन्न क्षेत्रों के बीच उत्पादन को बेहतर तरीके से वर्गीकृत करने की कोशिश करती है बजाय इसके कि विभिन्न गतिविधियों को एक साथ रखा जाए।

सेन ने इसे एक महत्वपूर्ण वैचारिक सुधार बताया लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि इसका मात्रात्मक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा, ‘विनिर्माण और सेवाओं का विभाजन महत्त्वपूर्ण है खासतौर पर ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां कंपनियां विभिन्न गतिविधियों में काम करती हैं। लेकिन अभी तक यह पता नहीं चला है कि इससे आंकड़ों में क्या बदलाव आया है। हमें यह नहीं पता कि क्या इसने विनिर्माण या सेवाओं को असमान रूप से लाभ पहुंचाया है क्योंकि कुल मिलाकर क्षेत्रीय स्तर पर कोई बड़ा नाटकीय संरचनात्मक बदलाव नहीं दिखता है।’

नए आधार वर्ष (2022-23) के तहत वर्ष 2023-24 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि में सबसे स्पष्ट प्रभाव दिखा है। पहले 2011-12 के आधार वर्ष के तहत इस वर्ष की वृद्धि 9.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था जबकि अब यह 7.2 प्रतिशत है। संशोधित अनुमानों के अनुसार वर्ष 2024-25 के लिए वृद्धि 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि पहले यह 6.5 प्रतिशत थी। वर्ष 2025-26 के लिए दूसरी अग्रिम अनुमानों में जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत के रूप में बताई गई है जो 2011-12 सीरीज के 7.4 प्रतिशत से थोड़ी अधिक है। यह संशोधन सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) डेटा में भी देखा जा सकता है।

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First Published - February 28, 2026 | 11:04 AM IST

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