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Economic Survey में बड़ी चेतावनी: ‘अस्थिर’ और ‘कम मददगार’ वैश्विक माहौल से बढ़ेगी भारत की चुनौतियां

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इसलिए कि दुनिया भर में व्यापार, निवेश और पूंजी प्रवाह दरअसल व्यापार उदारीकरण को छेड़कर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बदलाव से प्रभावित हो रहे हैं

Last Updated- January 29, 2026 | 10:29 PM IST
Economic reforms
फोटो क्रेडिट: Shutterstock

गुरुवार को पेश आर्थिक समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि भारत के लिए बाहरी माहौल शायद ‘अस्थिर’और ‘कम मददगार’ रहेगा। इसलिए कि दुनिया भर में व्यापार, निवेश और पूंजी प्रवाह दरअसल व्यापार उदारीकरण को छेड़कर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बदलाव से प्रभावित हो रहे हैं। 

भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि निवेश के लिए और अधिक टक्कर लेनी पड़ सकता है, मुमकिन है कि वैश्विक व्यापार में वृद्धि धीमी हो और दूसरे देशों से आने वाला पैसा नीतियों और भू-राजनीतिक घटनाक्रम से जल्द प्रभावित हो। भारत के बाहरी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश, पूंजी प्रवाह और बाहरी कर्ज शामिल हैं जो देश की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को आकार देते हैं और दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने का संकेत देते हैं।

समीक्षा में कहा गया है, ‘वैश्विक स्तर पर एक साथ तीन बड़ी मुश्किलें आ रही हैं: पहली, व्यापार को लेकर नीतियों में अनिश्चितता है क्योंकि संरक्षणवाद बढ़ रहा है और जवाबी शुल्क लगाए जा रहे हैं और दूसरी, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं रणनीतिक रूप से एक-दूसरे से अलग होती जा रही हैं और तीसरी, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले अब व्यापार नीति में भी शामिल किए जा रहे हैं।’ इसमें यह भी बताया गया है कि कुछ अहम क्षेत्रों में बदलाव हो रहे हैं, जैसे सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, दूरसंचार ढांचा और दवा के लिए कच्चा माल।

समीक्षा में यह भी कहा गया है कि भारत का बाहरी क्षेत्र मजबूत बना हुआ है क्योंकि भारत दुनिया के साथ और गहराई से जुड़ रहा है, निर्यात बढ़ रहा है, सेवाओं का व्यापार अच्छा चल रहा है और व्यापार नेटवर्क में विस्तार हो रहा है। लेकिन, आगे चलकर, नीति बनाने वालों के सामने चुनौती होगी कि वह इन मजबूतियों का इस्तेमाल कर, भारत के बाहरी क्षेत्र को स्थिर रखें और विकास की रफ्तार भी बनाए रखें।

दुनिया में व्यापार और निवेश पर अब ‘सिर्फ अर्थव्यवस्था से जुड़े कारणों’ का ही असर नहीं पड़ रहा है, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों का भी असर पड़ रहा है।

समीक्षा में कहा गया है, ‘मध्यम से लंबी अवधि में, यह उन नीतियों का महत्त्व बताती है जो घरेलू बचत जुटाने की कोशिश के साथ-साथ विनिर्माण प्रतिस्पर्धा, नवाचार, उत्पादकता और गुणवत्ता का समर्थन करती हैं।’

समीक्षा में मौजूदा माहौल में मजबूत निर्यात वृद्धि हासिल करने के महत्त्व पर जोर दिया गया है जिससे निर्यात आधारित नीति अहम जरूरत बन जाती है। एक मजबूत और स्थिर मुद्रा केवल निर्यात प्रतिस्पर्धा से हासिल की जा सकती है। समीक्षा में कहा गया है कि निर्यात बढ़ाने के लिए विनिर्माण लागत कम करने के लिए एक संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। उलट शुल्क ढांचे को सही करते हुए लॉजिस्टिक्स ढांचे में सुधार से लॉजिस्टिक्स लागत और नियामकीय खर्चों को घटाते हुए तथा कुछ हद तक आयात प्रतिस्थापन से विनिर्माण लागत कम की जा सकती है।

पिछले पांच वर्षों में आधा दर्जन से अधिक देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वैश्विक अनिश्चितता के बीच विश्वसनीय बाजार तक पहुंच देते हुए देश की व्यापार रणनीति का समर्थन करते हैं। ये समझौते निर्यात-केंद्रित कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक जुड़ने में सक्षम बनाते हैं और स्थानीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से वाकिफ कराते हैं।

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First Published - January 29, 2026 | 10:29 PM IST

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