धर्मार्थ ट्रस्टों और गैर-लाभकारी संगठनों के लिए पंजीकरण प्रक्रिया सरल होगी व रिकॉर्ड रखने की जरूरत कम हो जाएगी। यह जानकारी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के शुक्रवार को अधिसूचित आयकर नियमों, 2026 में दी गई। आयकर अधिनियम, 2025 को 1 अप्रैल से लागू किया जाना है और इससे पहले यह नियम जारी किए गए हैं।
ये नियम धर्मार्थ ट्रस्टों के पंजीकरण और कर-कटौती योग्य दान की स्वीकृति के लिए एक ही निर्धारित प्रपत्र प्रस्तुत करते हैं। यह पहले की बहु-चरणीय प्रक्रिया का स्थान लेता है।
अस्थायी पंजीकरण की स्वीकृति अब संबंधित कर अधिकारियों के बजाय केंद्रीकृत प्रसंस्करण केंद्र (सीपीसी) के माध्यम से दी जाएगी। इसका उद्देश्य देश भर में गति और एकरूपता में सुधार करना है। नए प्रारूप के तहत यदि ट्रस्ट ने पहले ही गतिविधियां शुरू कर दी हैं या उसके पास कोई अन्य पंजीकरण है तो अस्थायी पंजीकरण को अमान्य (शुरू से ही अमान्य) माना जा सकता है। यदि कोई कर लाभ नहीं लिया गया है तो ट्रस्ट स्वेच्छा से अपना पंजीकरण रद्द कर सकते हैं। यदि वे भविष्य में कर लाभ न लेने का वचन देते हैं तो इसे कभी स्वीकृत नहीं माना जाएगा। सीबीडीटी ने आय संचय के उद्देश्य में परिवर्तन की खातिर अनुमोदन चाहने वाले ट्रस्टों के लिए विशेष निर्धारित प्रपत्र भी जारी किया है।
एक महत्त्वपूर्ण राहत के रूप में रिकॉर्ड रखने की अवधि को घटाकर संबंधित कर वर्ष की समाप्ति के छह वर्ष कर दिया गया है। हालांकि पहले आकलन वर्ष की समाप्ति से 10 वर्ष पहले तक का था।
आयकर अधिनियम, 1961 द्वारा शासित पूर्व व्यवस्था के तहत नवगठित ट्रस्ट गतिविधियों को शुरू करने से पहले प्रपत्र 10ए में अनंतिम पंजीकरण के लिए आवेदन करते थे। इससे संबंधित क्षेत्राधिकार के प्रधान आयकर आयुक्त (छूट) प्रोसेस करता है और यह तीन वर्षों के लिए वैध रहता था।
संचालन शुरू करने के बाद ट्रस्टों को फॉर्म 10एबी में नियमित पंजीकरण के लिए आवेदन करना होता था, जो पांच वर्षों के लिए वैध होता था। इसमें लेखापरीक्षित खातों और गतिविधि रिपोर्टों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करना होता था। यह प्रक्रिया विकेंद्रीकृत रही। इसके कारण अक्सर विभिन्न क्षेत्राधिकारों में देरी और भिन्नताएं देखने को मिलती थीं।
अनंतिम पंजीकरण को आसानी से सरेंडर करने का कोई औपचारिक विकल्प नहीं था और ट्रस्ट के उद्देश्यों को बदलने के लिए किसी समर्पित फॉर्म के बिना एक अलग आवेदन की आवश्यकता होती थी।
ध्रुव एडवाइजर्स के पार्टनर संदीप भल्ला ने इन बदलावों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सामान्य फॉर्म और सीपीसी के माध्यम से केंद्रीकृत प्रसंस्करण से बहुत आवश्यक एकरूपता और गति आएगी। उन्होंने कहा, ‘स्वैच्छिक सरेंडर का विकल्प और रिकॉर्ड रखने की अवधि में कमी छोटे संगठनों के लिए विशेष रूप से स्वागत योग्य है। कारण यह है कि इससे अनुपालन का बोझ और कागजी कार्रवाई काफी कम हो जाती है।’
रस्तोगी चैंबर्स के संस्थापक अभिषेक ए रस्तोगी ने कहा कि नए प्रावधान गैर-लाभकारी क्षेत्र के लिए व्यावहारिक रूप से राहत प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा, ‘यदि ट्रस्टों का उपयोग नहीं किया जाता है तो वे अब अस्थायी पंजीकरण से आसानी से बाहर निकल सकते हैं। केवल छह वर्षों तक रिकॉर्ड रखने से समय और लागत की काफी बचत होगी, विशेष रूप से छोटे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और नव स्थापित ट्रस्टों के लिए।’
सीबीडीटी ने अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (एफएक्यू) की सूची भी जारी की है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि 1961 अधिनियम के तहत दिए गए सभी मौजूदा पंजीकरण और अनुमोदन वैध बने रहेंगे। वित्तीय वर्ष 2025-26 और उससे पहले की अवधियों के लिए आकलन, अपील और अनुपालन दायित्व पुराने कानून के तहत बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे।
एफएक्यू में दोहराया गया है कि सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 आयकर अधिनियम, 1961 के निरसन पर लागू होगी। यह तय करता है कि पुराने कानून के तहत उत्पन्न अधिकार, लाभ, दायित्व और देनदारियां नए अधिनियम के बचत प्रावधानों में स्पष्ट रूप से दिए गए प्रावधानों से परे भी बनी रहेंगी। इन व्यापक कानूनी सिद्धांतों को लागू करके, ढांचा अप्रत्याशित स्थितियों को भी कवर करता है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की पार्टनर ऋचा साहनी ने कहा, ‘कुल मिलाकर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों से करदाताओं को आश्वस्त करने वाला संदेश मिलता है कि आयकर अधिनियम, 2025 में परिवर्तन सुचारू और बिना किसी बाधा के होगा। सीबीडीटी ने मौजूदा अधिकारों को संरक्षित करके, प्रक्रियाओं की निरंतरता सुनिश्चित करके और संक्रमणकालीन मुद्दों पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करके अनिश्चितता को कम करने और करदाताओं को हाल के दशकों में हुए सबसे महत्त्वपूर्ण कर कानून सुधारों में से एक को समझने में मदद करने का प्रयास किया है।’