दुनिया की अर्थव्यवस्था पर एक नया संकट मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता रहा और तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरी मुश्किल में फंस सकती है। संस्था ने साफ संकेत दिया है कि हालात बिगड़ने पर दुनिया मंदी की तरफ बढ़ सकती है। 2026 के लिए वैश्विक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 3.1 प्रतिशत कर दिया गया है, जो पहले से कम है और चिंता बढ़ाने वाला है।
कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी हैं और यही सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं। महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता, यह हर चीज को महंगा कर देता है। फैक्ट्री से लेकर ट्रांसपोर्ट तक हर जगह लागत बढ़ती है और इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। जैसे ही खर्च बढ़ता है, बाजार की रफ्तार धीमी पड़ने लगती है।
आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि अगर तनाव और बढ़ा और तेल महंगा बना रहा, तो वैश्विक वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत तक गिर सकती है। वहीं, सबसे खराब स्थिति में यह 2.0 प्रतिशत तक आ सकती है। यह वही स्तर है, जब दुनिया पहले बड़े आर्थिक झटके झेल चुकी है, चाहे वह 2009 का वित्तीय संकट हो या 2020 की महामारी। यानी खतरा सिर्फ धीमी रफ्तार का नहीं, बल्कि ठहराव का है।
तेल की ऊंची कीमतें महंगाई को और भड़का सकती हैं और यह 6 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के पास ब्याज दरें बढ़ाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचता। लेकिन ब्याज दर बढ़ने का मतलब है महंगा कर्ज, कम निवेश और कमजोर होती आर्थिक गतिविधियां। यानी एक तरफ महंगाई, दूसरी तरफ धीमी वृद्धि, दोनों मिलकर अर्थव्यवस्था को जकड़ सकते हैं।
इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ेगा जो तेल के आयात पर निर्भर हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाएं खासतौर पर दबाव में आ सकती हैं, क्योंकि उनके लिए महंगे तेल और बढ़ती महंगाई को संभालना आसान नहीं होता। कई देशों के लिए यह दोहरी मार साबित हो सकती है।
इस मुश्किल माहौल में भारत एक राहत भरी तस्वीर पेश करता नजर आ रहा है। आईएमएफ ने भारत की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। मजबूत घरेलू मांग और नीतिगत फैसलों ने भारत को इस वैश्विक अनिश्चितता के बीच भी संभाले रखा है। यही वजह है कि भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा रहा है।