पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ते ही सबसे पहले झटका तेल बाजार को लगा। सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे बड़े सप्लायर अचानक पीछे हटे और सप्लाई में तेज गिरावट आ गई। फरवरी तक जहां हर हफ्ते भारी मात्रा में तेल बाजार में आ रहा था, वहीं मार्च में सप्लाई लगभग गायब हो गई। नतीजा साफ है, बाजार में कमी और कीमतों में उछाल। कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया और ट्रेंड अभी भी ऊपर की तरफ है।
इस झटके का सीधा असर भारत पर पड़ा। मार्च के पहले हफ्ते में भारत का तेल आयात गिरकर 1.9 मिलियन बैरल पर आ गया, जबकि कुछ ही हफ्ते पहले यह 25 मिलियन बैरल के आसपास था। यानी सप्लाई चेन में ऐसा ब्रेक लगा कि भारत जैसे बड़े आयातक को भी अचानक झटका लग गया। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले समय की चेतावनी है।
Systematix Institutional Equities की रिपोर्ट बताती है कि तेल की कीमत जैसे-जैसे बढ़ी, भारत का आर्थिक गणित गड़बड़ाने लगा। फरवरी में जहां औसत कीमत 69 डॉलर थी, वहीं मार्च में यह 110 डॉलर के पार पहुंच गई। इसका सीधा असर ट्रेड डेफिसिट पर पड़ा। सिर्फ एक महीने में 4 अरब डॉलर से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ जुड़ने का अनुमान है। अगर कीमतें यहीं टिकी रहीं, तो यह और बढ़ सकता है।
सबसे अहम बात, हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल में हर महीने करीब 166 मिलियन डॉलर जोड़ देती है। यानी तेल सिर्फ महंगा नहीं हुआ, बल्कि अर्थव्यवस्था को खींच रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अंदर की तस्वीर और भी गंभीर है। पेट्रोल और डीजल बेचने वाली कंपनियां भारी नुकसान उठा रही हैं। मार्च में अब तक करीब 8,800 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। हर दिन 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा बढ़ रहा है। पिछले 15 दिनों के औसत के हिसाब से डीजल पर 36 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर करीब 17.5 रुपये प्रति लीटर का नुकसान चल रहा है, जो मौजूदा हालात में यह घाटा और बढ़कर डीजल पर 55 रुपये और पेट्रोल पर 25 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। सीधी बात, यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं चल सकती। कीमतें बढ़ना अब लगभग तय माना जा रहा है।
तेल के बाद दूसरा बड़ा झटका गैस मार्केट को लगा। कतर से सप्लाई लगभग ठप हो गई और LNG की कीमतें सीधे दोगुनी होकर 10 डॉलर से 20 डॉलर प्रति mmbtu तक पहुंच गईं। भारत की करीब 25 प्रतिशत गैस सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका असर उर्वरक, बिजली और इंडस्ट्री पर पड़ना तय है। ऊर्जा का हर स्रोत महंगा हो रहा है और इसका असर हर सेक्टर में दिखेगा।
इस संकट में हर कोई नहीं हार रहा। तेल और गैस निकालने वाली कंपनियां इस माहौल में कमाई कर सकती हैं। लेकिन जो कंपनियां इनका इस्तेमाल करती हैं, उनके लिए यह बड़ा झटका है। गैस आधारित कंपनियों पर खास दबाव रहेगा। ब्रोकरेज ने रिलायंस, दीप इंडस्ट्रीज और गल्फ ऑयल जैसे स्टॉक्स को लेकर बुलिश रुख अपनाया है, जबकि गैस कंपनियों को लेकर सतर्कता दिखाई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या यह सिर्फ शुरुआत है? अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबा चलता है, तो सप्लाई सामान्य होने में समय लगेगा। इसका मतलब है कि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। ऊर्जा महंगी, खर्च बढ़ा, कंपनियां दबाव में और आम आदमी पर असर, यह पूरा चक्र अब शुरू हो चुका है।