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अध्ययन की थीं कुछ सीमाएं: भारत बायोटेक

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Last Updated- December 12, 2022 | 3:53 AM IST

टीका विनिर्माता कंपनी भारत बायोटेक ने उस अध्ययन पर सवाल खड़ा किया है जिसमें कहा गया है कि जिन स्वास्थ्यकर्मियों को कोविशील्ड लगाया गया था उनमें अधिक प्रतिरोधी क्षमता (एंटीबॉडी) विकसित हुई थी। भारत बायोटेक का कहना है कि ऐसे अध्ययनों की अपनी सीमाएं होती हैं। चिकित्सकों का एक समूह एक अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है। कंपनी में कोविड-19 परियोजना प्रमुख रैचेज एल्ला ने ट्विटर पर कहा कि उन्हें हैरानी हो रही है कि मीडिया और शोधकर्ता बिना किसी पुख्ता शोध और जांच पड़ताल के ही इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं। एल्ला ने कहा कि उन्हें लगता है कि इस अध्ययन की अपनी कुछ सीमाएं थी, इसलिए किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि पहली बात तो यह कि कोवैक्सीन के असर का अध्ययन करने के लिए स्पाइक आधारित आईजीजी सही माध्यम नहीं है। कोवैक्सीन स्पाइक, एन और एम के प्रति अधिक प्रतिक्रियाएं दिखाता है। एल्ला के अनुसार दूसरी बात यह है कि कोविड से जुड़ी पिछली जानकारियां मौखिक आधार पर जुटाई गई थीं, न कि टीकाकरण से पहले आईजीजी जांच से। एल्ला ने कहा, ‘अध्ययन में बिना लक्षण वाले पहलू पर विचार नहीं किया गया है और अध्ययन में पूर्वग्रह भी दिखता है। सार्स-सीओवी-2 परीक्षण में भाग लेने वाले लोग आखिर उतने भी भोले नहीं हो सकते हैं।’
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद में महामारी एवं संक्रमण विभाग के प्रमुख समीरन पांडा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया था कि एंटीबॉडी बनी है या नहीं यह एक बाइनरी वैरिएबल है। उन्होंने कहा था कि दो समूहों के बीच माध्य में अंतर का पता लगाना जरूरी है। पांडा ने कहा था, ‘एंटीबॉडी बनी हैं या नहीं यह एक बाइनरी वैरिएबल है। हालांकि मात्रात्मक स्तर पर तुलना से जो नतीजा निकला है उसकी भी समीक्षा की जरूरत होती है। मात्रात्मक तुलना दो समूहों के बीच माध्य का अंतर होता है।’
उन्होंने कहा था कि इन तुलनाओं के लिए एक बड़ी आबादी पर अध्ययन किया जाता है केवल किसी खास व्यक्ति तक यह सीमित नहीं होता है। हालांकि अध्ययन में शामिल करने के लिए लोगों का चयन लक्षित आबादी में अलग-अलग जगहों से करना पड़ता है। पांडा ने कहा, ‘मनमाने ढंग से नमूने तैयार करने से भ्रम की स्थिति बनती है और सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती है।’
 पांडा का कहना था कि प्रतिरोधी क्षमता केवल ह्यूमरल इम्युनिटी (एंटीबॉडी आधारित प्रतिरोधी क्षमता) से नहीं आती है बल्कि सेल्युलर इम्युनिटी (एंटीजन के खिलाफ फेगोसाइट्स, टी लिम्फोसाइट्स आदि के सक्रिय होने की प्रक्रिया) से भी निर्धारित होती है। उन्होंने कहा, ‘हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रतिरोध क्षमता का केवल टीकाकरण के बाद ही नहीं बल्कि सेल्युलर आर्म से भी होता है। सेल्युलर आर्म इम्युन मेमरी सेल पैदा करती है।’
 इस अध्ययन के अनुसार कोविशील्ड की दो खुराक दिए जाने के बाद 98 प्रतिशत लोगों में एंटीबॉडी बन गई थी। कोवैक्सीन के मामले में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत था। चिकित्सकों के एक समूह ने यह अध्ययन प्रकाशित किया है, हालांकि इसकी अब तक जांच पड़ताल नहीं हुई है। शोधकर्ताओं ने कहा है किसी प्रतिस्पद्र्धा के लिए यह परीक्षण नहीं किया गया है और न ही इसके लिए कोई रकम मिली है।
उनके अनुसार इस अध्ययन का मकसद भारतीयों में कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दो खुराक दिए जाने के बाद एंटीबॉडी का विश्लेषण करना था। लेखकों ने कहा, ‘हमने भारतीय स्वास्थ्य कर्मियों को कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दो खुराक लगाने के बाद उनमें ह्यमरल इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया।’
इस अध्ययन में भाग लेने वाले 515 स्वास्थ्य कर्मियों में दोनों खुराक लेने के बाद 95 प्रतिशत लोगों में एंटीबॉडी पाई गई। इनमें 425 को कोविशील्ड लगाया गया था, जिनमें 98.1 प्रतिशत में एंटीबॉडी बन गई। 90 लोगों को कोवैक्सीन लगाया गया था जिनमें 80 प्रतिशत में एंटीबॉडी बन गई थी।

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First Published - June 8, 2021 | 11:28 PM IST

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