बीएस बातचीत
मिलिंद बर्वे इस सप्ताह एचडीएफसी म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी से सेवानिवृत हो गए। चिराग माडिया के साथ एक साक्षात्कार में बर्वे ने पिछले दो दशकों के दौरान अपने अनुभवों और चुनौतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:
आप ऐसे समय में सेवानिवृत हो रहे हैं जब उद्योग की प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियां (एयूएम) 30 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को हासिल कर चुकी हैं। अगले 30 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य कब तक हासिल होने की संभावना है?
एमएफ उद्योग उत्पादों की जागरूकता के संदर्भ में 5-10 साल पहले के मुकाबले अब काफी बेहद स्थिति में है। उद्योग के संयुक्त प्रयासों और वितरण समुदायों के समर्थन को देखते हुए, वृद्घि की रफ्तार भविष्य में काफी तेज रहेगी। मैं इन वर्षों की संख्या के बारे में कोई लक्ष्य निर्धारित करना नहीं चाहता।
चूंकि लार्ज फंड हाउस के मुखिया के तौर पर आपने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आपके लिए बेहद खास क्या रहा?
वर्ष 2000 में, जब हमने शुरुआत की, इक्विटी की तुलना में डेट ज्यादा लोकप्रिय था, क्योंकि उसमें 10 वर्षीय प्रतिफल 10 प्रतिशत से ज्यादा था। वर्ष 2003 और 2008 के बीच, इक्विटी बाजारों में शानदार प्रतिफल दर्ज किया गया था। बाद में वैश्विक वित्तीय संकटों की वजह से बड़ी गिरावट आई। अन्य घटनाक्रम, जिसे मैं याद रख सकता हूं, 2013 की मंदी थी जिससे बड़े उतार-चढ़ाव को बढ़ावा मिला। कोविड-19 महामारी ताजा उदाहरण है। हालांकि यह एक स्वास्थ्य संकट ज्यादा रहा, लेकिन साथ ही इससे वित्तीय बाजार भी प्रभावित हुए हैं। शुरू में लोगों को इस महामारी की गंभीरता और इससे निपटने के तरीकों का अंदाजा नहीं था। लेकिन जैसा कि आपने देखा है, बाजारों ने तेज सुधार के साथ हमें चकित किया है।
परिसंपत्ति प्रबंधन उद्योग पिछले दशक के दौरान काफी विकसित हुआ है। इसमें खास बदलाव क्या आया है?
खुलासा मानकों और हरेक क्षेत्र में बड़ा सुधार आया है। हमारे पास अब ज्यादा मजबूत नियामकीय ढांचा है। इस सबसे म्युचुअल फंडों में निवेश सुरक्षित और ज्यादा पारदर्शी हो गया है। मैं इसके लिए सेबी को ज्यादा श्रेय देना चाहूंगा। नियमन में बदलाव निवेशकों के भरोसे और उनके हितों को सुरक्षित बनाने के प्रयासों पर केंदित रहे हैं।
एचडीएफसी एमएफ में आपके कार्यकाल के दौरान सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण समय कौन सा था?
मैं उस दौर को याद नहीं करना चाहता, लेकिन पीछे देखूं तो पता चलता है कि 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट से भारत के साथ साथ पूरी अर्थव्यवस्था बेहद प्रभावित हुई थी। हालांकि यह संकट भारत में उत्पन्न नहीं हुआर था, लेकिन हमें भी, खासकर डेट बाजार में इसके प्रभाव का सामना करना पड़ा था। लिक्विड फंडों में पूंजी निकासी और निवेश के प्रबंधन के लिहाज से यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय था। आखिरकार हम इससे उबरे और मेरा मानना है कि हमने इससे कई खास सबक सीखे, खासकर इस बारे में कि लिक्विड फंडों का प्रबंधन कैसे किया जाता है।
कॉरपोरेट डेट दबाव को दूर करना एक बड़ी चुनौती रही। उससे आपको क्या सीख मिली?
दुर्भाग्यपूर्ण, कुछ खास एनबीएफसी में दबाव के बाद, इस क्षेत्र के लिए निवेश सुर्खियों में रहा है। बाजार ने मजबूत एनबीएफसी और कम मजबूत के बीच अंतर तलाशना शुरू किया है। इससे अंतर मूल्य निर्धारण को बढ़ावा मिला है। यह एनबीएफसी द्वारा ाजार से कोष उगाही की राह में स्पष्ट दिखा था। इससे एनबीएफसी के लिए हमारे निवेश को लेकर कुछ चिंता पैदा हुई। लेकिन नियामकों द्वारा उठाए गए त्वरित कदमों और तरलता की स्थिति में सुधार से संक्षिप्त अवधि में सुधार आया। इससे यह भरोसा बढ़ा कि एनबीएफसी का कायाकल्प होगा। मुख्य सबक यह रहा कि यदि आप एनबीएफसी से उधार ले रहे हैं तो खास ध्यान परिसंपत्ति गुणवत्ता पर रहना चाहिए, लेकिन फिर भी मुख्य ध्यान परिसंपत्ति देनदारी समावेश पर होना चाहिए।
क्या आप मानते हैं कि ऐक्टिव-पैसिव परिसंपत्ति मिश्रण में बदलाव आएगा?
मेरा माना है कि ऐक्टिव और पैसिव दोनों ही निवेशकों के पोर्टफोलियो का हिस्सा बने रहेंगे। मैं नहीं मानता कि पैसिव फंडों का उभार ऐक्टिव निवेश को प्रभावित करेगा। निवेशक इंडेक्स फंडों या ईटीएफ में निवेश बरकरार रखेंगे, लेकिन मिड-कैप और स्मॉल-कैप जैसे कुछ खास सेगमेंटों में इंडेक्स फंड नहीं हैं, क्योंकि इनकी लागत ऊंची है। कुल मिलाकर, भारत में ऐक्टिव और पैसिव फंडों के सह-अस्तित्व के लिए अच्छी संभावना है।