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डीपीडीपी अनुपालन की समयसीमा घटने से बढ़ेंगी तकनीकी चुनौतियां, Meta ने जताई चिंता

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मेटा ने डीपीडीपी अनुपालन की समयसीमा घटाने पर चिंता जताई और कहा कि भारत में एआई प्रतिभा पर्याप्त है, लेकिन तकनीकी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

Last Updated- February 23, 2026 | 6:42 AM IST
DPDP rules
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डिजिटल व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा (डीपीडीपी) अधिनियम के कुछ प्रावधानों के अनुपालन के लिए समयसीमा को मौजूदा 18 महीनों से घटाकर 12 महीने किए जाने के सरकार के प्रस्ताव से कई व्यवहारिक चुनौतियां पैदा होंगी। मेटा के प्रमुख (वैश्विक नीति) केविन मार्टिन ने आशिष आर्यन से बातचीत में यह बात कही। वह इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में भाग लेने के लिए भारत आए थे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में एआई प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। मुख्य अंश:

डीपीडीपी अनुपालन के लिए समयसीमा को कम किए जाने संबंधी प्रस्ताव के बारे में आपकी क्या चिंताएं हैं?

समयसीमा को 18 महीने से घटाकर 12 महीने किए जाने के प्रस्ताव पर हमारी कुछ चिंताएं हैं। हमें लगता है कि इसमें कोई बदलाव न करना ही समझदारी होगी। मैं समझता हूं कि  हमारी सभी प्रणालियों को समायोजित करने और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिहाज से 18 महीने की मूल समयसीमा भी कम है। देश के नियमों और विशेरू रूप से भारत जैसे महत्त्वपूर्ण बाजार में नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है। मगर समयसीमा को कम करना उचित नहीं होगा।

कृत्रिम तौर पर सृजित सूचनाओं को हटाने के लिए भी अनुपालन की समयसीमा भी कम कर दी गई है। इस पर आप क्या कहेंगे?

इसके लिए समयसीमा काफी कम है जो लगभग तत्काल करने जैसा है। तकनीकी तौर पर देखा जाए तो यह काफी जटिल प्रक्रिया है और इसलिए यह हमारे लिए एक अहम चुनौती है। हम कृत्रिम तौर पर सृजित सूचनाओं के बारे में चिंताओं को दूर करने के लक्ष्य को साझा करते हैं। हमारे पास ऐसी प्रणालियां हैं जो शिकायत मिलने या सरकार की ओर से अनुरोध मिलने पर संबंधित सामग्री को हटा देती हैं। मगर कुछ नई आवश्यकताओं के लिए हमें लोगों द्वारा ऐसी सामग्रियों को अपलोड किए जाने से पहले ही कुछ उपाय करना होगा। इस तरह की प्रणाली बहुत काफी बोझिल है और वह उपभोक्ताओं एवं उपयोगकर्ताओं के लिए भी बोझिल हो सकती है। हम इस मुद्दे पर सरकार से बात कर रहे हैं और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत करा रहे हैं ताकि जल्द से जल्द अनुपालन सुनिश्चित हो सके।

एआई के बारे में मेटा का व्यापक दृष्टिकोण क्या है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए?

हमारे एआई के विकास के लिए कई बातें महत्त्वपूर्ण हैं, जैसे सही प्रतिभा, कंप्यूटिंग के लिए पर्याप्त ऊर्जा और डेटा तक पहुंच। ये हमारे दृष्टिकोण की प्रमुख बातें हैं। हम एआई के बारे में भारत के सामान्य दृष्टिकोण से काफी उत्साहित और आशान्वित हैं। यह प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। भारत में लगभग 90 फीसदी स्टार्टअप अपने कार्यों में एआई का उपयोग कर रही हैं। यहां का प्रतिभा भंडार लंबे समय से चर्चित रहा है, लेकिन एआई पर ध्यान केंद्रित करना महत्त्वपूर्ण है। मैं समझता हूं कि हमें एक ऐसे नियामकीय माहौल की जरूरत है जो नवाचार को प्रोत्साहित करे।

सॉवरिन एआई क्षमता विकसित करने की होड़ के बारे में आप क्या कहेंगे?

हमारे लिए यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है कि हमारे द्वारा प्रदान की जाने वाली एआई सेवाएं सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक हों और अधिकतर लोगों के लिए सुलभ हों। यह ओपन-सोर्स वैकल्पिक दृष्टिकोण का एक लाभ है। सॉवरिन मॉडल का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि उपयोगकर्ताओं को एआई तक पहुंच उसी तरीके से मिले जैसे वे चाहते हैं और जो उनके लिए प्रासंगिक है। मैं समझता हूं कि सरकार या सॉवरिन मॉडल के बिना भी ऐसा किया जा सकता है। पूरे परिवेश को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए जो स्टार्टअप के लिए सुविधाजनक हो।

चर्चा है कि ओपन एआई मॉडल के लिए लगातार सुझाव दिए जाने के बावजूद मेटा एक प्रोपराइटरी एआई मॉडल भी चाहती है। इस पर आप क्या कहेंगे?

हम हमेशा से मानते रहे हैं कि प्रोपराइटरी और ओपन एआई मॉडल दोनों हो सकते हैं। एआई परिवेश के लिए दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। कुछ चीजें हम प्रोपराइटरी आधार पर लाना चाहते हैं लेकिन हम उन मॉडलों को बेचने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। भारत में भी हमारी साझेदारियां हैं और समय के साथ-साथ उनमें से कुछ प्रोपराइटरी मॉडल में विकसित हो सकती हैं। हालांकि हम ओपन सोर्स का समर्थन करना जारी रखेंगे। यह एक दोहरी प्रणाली होगी।

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First Published - February 23, 2026 | 6:42 AM IST

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