वर्ष 2020 में 1-लाख करोड़ रुपये की श्रेणी में पीएसयू भागीदारी में कमी आई है। 1 लाख करोड़ रुपये या इससे अधिक बाजार पूंजीकरण वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की संख्या चालू वर्ष में 4 तक घट गई है। इस ट्रीलियन क्लब से बाहर हुई कंपनियां हैं आईओसीएल, एनटीपीसी, और कोल इंडिया। साल में अब तक (वाईटीडी) आधार पर, बीएसई पीएसयू सूचकांक 18 प्रतिशत घटा है। तुलनात्मक तौर पर सेंसेक्स में महामारी की वजह से पैदा हुए दबाव के बावजूद 13.7 प्रतिशत की तेजी आई है। ट्रीलियन क्लब में दो पीएसयू कंपनियों ने अपने बाजार पूंजीकरण में गिरावट भी दर्ज की है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बाजार पूंजीकरण में 20 प्रतिशत की कमी आई, जबकि ओएनजीसी का बाजार पूंजीकरण 27 प्रतिशत घटा है।
इक्विनोमिक्स के संस्थापक जी चोकालिंगम का कहना है, ‘एसबीआई पर महामारी की वजह से प्रभाव पड़ा था। निजी बैंकों को छोड़कर पूरा बैंकिंग क्षेत्र प्रभावित हुआ है।’ रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और इन्फोसिस ने समग्र तौर पर अपने बाजार पूंजीकरण में अच्छी तेजी दर्ज की। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने बाजार पूंजीकरण में 3.5 लाख करोड़ रुपये का इजाफा किया, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने 2.8 लाख करोड़ रुपये, और इन्फोसिस ने 2.1 लाख करोड़ रुपये की वृद्घि दर्ज की। समग्र आधार पर सबसे बड़ी कमजोरी एसबीआई के बाजार पूंजीकरण में दर्ज की गई थी। उसकी बाजार वैल्यू 59,750 करोड़ रुपये तक घटकर 2.3 लाख करोड़ रुपये रह गई। ओएनजीसी का बाजार पूंजीकरण 44,786 करोड़ रुपये या 27 प्रतिशत तक घटकर 1.1 लाख करोड़ रुपये, और आईटीसी के लिए यह 35,000 करोड़ रुपये तक घटकर 2.5 लाख करोड़ रुपये रह गया।
विश्लेषकों का कहना है कि निरंतर वृद्घि के अभाव, क्षेत्रों में परिचालन बाजार के अनुकूल नहीं रहना, और क्षेत्र संबंधित समस्याएं पीएसयू की उपस्थिति 1 लाख करोड़ रुपये के क्लब में घटने की मुख्य वजह रही हैं। चोकालिंगम का कहना है, ‘फार्मा और आईटी कंपनियों को इस साल बाजार में अच्छी बढ़त मिली थी। इनमें से कोई भी कंपनी पीएसयू क्षेत्र में परिचालन नहीं करती है।’ उन्होंने कहा, ‘बिजली क्षेत्र में बकाया बिलों से जुड़ी समस्याएं हैं। डिस्कॉम अपने बकाया में सफल नहीं रही हैं। ओएनजीसी की सहायक इकाइयों ने दुनियाभर में तेल परिसंपत्तियां खरीदी हैं। इनमें से ज्यादातर को तब खरीदा गया था जब तेल तीन अंक के नजदीक था। अब तेल कीमतों में गिरावट आने से कंपनी को नुकसान हो रहा है।’
ईएसजी के तौर पर निवेश करने वाले विदेशी फंडों द्वारा दिलचस्पी नहीं दिखाए जाने से भी इन शेयरों के लिए निवेशक धारणा प्रभावित हुई है। अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा बनाने में विफलता और वृद्घि के क्षेत्रों में विविधता निवेशक उत्साह में बदलाव के अन्य कारण हैं। आईआईएफएल में शोध प्रमुख अभिमन्यु सोफट ने कहा, ‘सरकार इन कंपनियों को अपनी बैलेंस शीट का लाभ उठाने का मौका नहीं दे रही है। वह उन्हें लाभांश देने को कह रही है। इनमें से कुछ कंपनियां अपनी सौर परिसंपत्तियां और अक्षय ऊर्जा पोर्टफोलियो में बड़ा इजाफा कर सकती हैं। वे ग्रीन थीम में निवेश कर रही हैं। हालांकि वे जरूरी मात्रा में पैसा नहीं लगा रही हैं।’
विश्लेषकों का कहना है कि बैलेंस शीट मे सुधार लाने के लिए महत्वपूर्ण विनिवेश और पुनर्खरीद से पीएसयू कंपनियों की रेटिंग में सुधार देखा जा सकता है। सोफट ने कहा, ‘यदि प्रबंधन में बदलाव आया तो कंपनियों की रेटिंग में सुधार की संभावना मजबूत हो सकती है।’