स्विट्जरलैंड की दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी नोवार्टिस एजी को करारा झटका देते हुए भारतीय पेटेंट कार्यालय ने उसकी कैंसररोधी दवा ग्लाइवेक के पेटेंट आवेदन को रद्द कर दिया है।
इससे पहले पेटेंट कार्यालय ने इसी दवा की वीटा क्रिस्टल रूप के पेटेंट आवेदन को भी रद्द कर दिया था, जिसे मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है। ग्लाइवेक नोवार्टिस की मशहूर दवाओं में शुमार है और इससे कंपनी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आमदनी भी होती है।
हालांकि नोवार्टिस ने यह दावा किया है कि वे भारतीय रोगी, जो ग्लाइवेक का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से 99 फीसदी लोगों को यह मुफ्त में मिली है और 1 फीसदी लोगों को इस दवा के लिए उन्हें रिइंबर्समेंट मिल जाता है।
पेटेंट कार्यालय का यह आदेश 30 मार्च को तब आया, जब नोवार्टिस की इस पांच साल पुराने आवेदन को भारतीय दवा कंपनियों सन फार्मा, ओकासा और टाइम कैप फार्मा लैब्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विरोध दर्ज किया गया।
नोवार्टिस इंडिया के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक रंजीत साहनी ने कहा, ‘इमेटिनिब मेजाइलेट की अल्फा क्रिस्टलाइन रूप को पेटेंट नहीं मिलने से नोवार्टिस में खासा निराशा है। हमारे पास इस निर्णय की तहकीकात करने और विकल्प पर सोचने के लिए 90 दिनों का समय है।’
पेटेंट कार्यालय का यह निर्णय तब आया है, जब इस मामले पर बौद्धिक सपंदा अपीलीय बोर्ड अपना निर्णय सुनाने वाली थी। ग्लाइवेक के पेटेंट रद्द करने का यह मामला देश का पहला ऐसा मामला है, जिसमें पेटेंट कानून का विशेष उपबंध (3-डी) का इस्तेमाल किया गया है।
साहनी के मुताबिक ग्लाइवेक अंतरराष्ट्रीय रोगी सहायता कार्यक्रम के तहत नोवार्टिस ने 80 देशों के लगभग 35000 रोगियों को यह दवा मुफ्त में मुहैया कराई है। जीआईपीएपी के तहत भारत में 11000 रोगियों को यह दवा मुफ्त में उपलब्ध कराई गई है।
उन्होंने कहा, ‘2002 में जब पहली बार जीआईपीएपी को भारत में चलाया गया था, तो 2900 करोड़ रुपये से अधिक कीमत की दवा रोगियों को मुफ्त में दी गई थी।’