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दुनिया मुट्ठी में करने की बेकरारी अब नहीं

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Last Updated- December 11, 2022 | 1:41 AM IST

भारतीय कंपनियों के लिए विलय और अधिग्रहण के लिहाज से 2009 की पहली तिमाही खासी निराशाजनक रही है।
वेंचर इंटेलिजेंस की एक रपट के मुताबिक साल के हिसाब से देखा जाए तो इसमें 60 फीसदी की कमी आई है। वहीं क्रमिक तौर पर देखा जाए तो इसमें 40 फीसदी की कमी दर्ज  की गई है। इस तिमाही में विलय और अधिग्रहण से जुडे सिर्फ 54 मामलों में ही भारतीय कंपनियां शामिल रहीं।
पिछले साल की पहली तिमाही में भारतीय कंपनियां ने 135 समझौतों को अंजाम दिया था। जबकि ठीक इसके पहले वाली तिमाही में 89 समझौते हुए थे। इसमें घरेलू के अलावा विदेशी समझौते भी शामिल थे। वेंचर इंटेलिजेंस की एक रपट के मुताबिक इस साल की पहली तिमाही में कुल 26 समझौते ही हो पाए हैं।
ये समझौते 4.6 अरब डॉलर के हैं। इसमें 15 देसी-विदेशी समझौते हैं और 15 घरेलू अधिग्रहण के समझौते हैं। मैन्युफैक्चिरिंग के क्षेत्र में सबसे ज्यादा 10 समझौते हुए। जबकि इस मामले में 7 समझौते के साथ आईटी और आईटीईएस दूसरे पायदान पर रहा।
साल की पहली तिमाही में विलय और अधिग्रहण समझौतों को अंजाम देने वाली कंपनियों में हेल्थकेयर ऐंड लाइफ साइंस, फूड ऐंड बेवरेज, दूरसंचार और कृषि व्यापार से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हैं। भारत में हुए समझौतों में सबसे बड़ा सौदा फ्रांस की स्टेशनरी बनाने वाली कंपनी बीआईसी ने किया। इसने मुंबई की स्टेशनरी बनाने वाली कंपनी सेलो की 40 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी।
अन्य उल्लेखनीय सौदों में अमेरिकी टावर कॉरपोरेशन का एक्ससीईएल टेलिकॉम का हुआ समझौता शामिल है। वहीं माइलन लैब्स ने मैट्रिक्स लैबोरेटरिज की अहम हिस्सेदारी खरीदी। सोडेक्सो ने राधाकृष्ण होस्पिटैलिटी सर्विस ग्रुप्स का अधिग्रहण किया। 
वेंचर इंटेलिजेंस के सीईओ अरुण नटराजन ने कहा, ”राधाकृष्ण होस्पिटैलिटी और सेलो पेन का समझौता इस बात की पुष्टि करता है कि 2009 में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कई देसी समझौते हो सकते हैं।

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First Published - April 21, 2009 | 9:21 AM IST

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