घरेलू और विदेशी ब्रोकिंग फर्मों के रिसर्च एनालिस्टों के मुताबिक भारतीय कंपनियों की मार्च 2009 को खत्म हुई चौथी तिमाही में बैंक, कैपिटल गुड्स, इंजीनियरिंग, एफएमसीजी, सॉफ्टवेयर सेवाएं, तेल मार्केटिंग, पावर, दुपहिया और टेलिकॉम कंपनियां बिक्री और मुनाफे की ग्रोथ में दूसरों से आगे रहेंगीं।
इसके अलावा उम्मीद है कि सीमेन्ट, कंस्ट्रक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर और तेल और गैस कंपनियों का चौथी तिमाही में मुनाफा सालाना आधार पर पिछले साल जैसा ही रहेगा। ऑटो पुर्जे, ऑटोमोबाइल (हेवी और मीडियम-लाइट कॉमर्शियल वाहन), होटल, मीडिया, मेटल, फार्मा, रियालिटी, शिपिंग, शुगर और टेक्टाइल कंपनियों के नतीजे चौथी तिमाही में खराब रहने के आसार हैं।
ओएनजीसी समेत तेल मार्केटिंग कंपनियों के नतीजों बेहतर रहेंगे और कच्चे तेल की गिरती कीमतों की वजह से इनके मार्जिन में ग्यारह फीसदी तक का इजाफा देखा जा सकता है। दुपहिया और शुगर कंपनियों के मार्जिन में भी कच्चे माल की कीमतों में गिरावट आने और चीनी की कीमतें मजबूत रहने से डेढ़ फीसदी तक का इजाफा देखा जा सकता है।
एफएमसीजी, पावर और रीटेल कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में भी सुधार देखने को मिल सकता है। रुपए की कीमतों में गिरावट का सॉफ्टवेयर और फार्मा कंपनियों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है लेकिन इन दोनों ही सेक्टरों में एक्सपोर्ट रेवन्यू की हेजिंग और विदेशी मुद्रा के कर्ज पर होने वाले ट्रांसलेशन लॉस का असर इनके शुध्द मुनाफे पर पड़ सकता है।
सॉफ्टवेयर कंपनियों के मार्जिन पर इस सब का मामूली विपरीत प्रभाव देखा जा सकता है जबकि फार्मा कंपनियों पर 4.35 फीसदी का दबाव देखा जा सकता है। तेल और गैस सप्लाई करने वाली कंपनियां जैसे गेल, गुजरात गैस और पेट्रोनेट के मार्जिन में औसतन 6.30 फीसदी की गिरावट मार्जिन में देखी जा सकती है जबकि बैंकिंग सेक्टर की कंपनियों के मार्जिन में ट्रेजरी इनकम की कमाई कम रह जाने से चार फीसदी की गिरावट देखी जा सकती है।
ऑटो पुर्जे, ऑटोमोबाइल कॉमर्शियल वाहन, शिपिंग, मीडिया और टेलिकॉम कंपनियों के मार्जिन में भी लागत बढ़ने से दो से ढाई फीसदी की गिरावट देखी जा सकती है। मेटल, फेरस और नॉन फेरस और रियालिटी कंपनियों के नतीजे भी रियलाइजेशन कम रहने और मांग में कमी आने से खराब रह सकते हैं। नॉन फेरस मेटल्स के ऑपरेटिंग मार्जिन में 15 फीसदी तक की कमी देखी जा सकती है जबकि स्टील कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में दस फीसदी तक की कमी देखी जा सकती है।
मकानों और कॉमर्शियल स्पेस की मांग में कमी आने का रियालिटी कंपनियों पर करारा असर पड़ सकता है और इनके मार्जिन में 12 फीसदी तक की कमी देखी जा सकती है। फेरस और नॉन फेरस मेटल कंपनियों की बिक्री और उनके मुनाफे में भी चौथी तिमाही में गिरावट देखने को मिल सकती है। विदेशी मुद्रा के नुकसान के लिए एकाउंटिंग नीति बदली जा सकती है और कंपनियों ने कहा है कि उन्हे फॉरेक्स लॉस को मार्क टु मार्केट आधार पर तय करने की अनुमति दी जाए।
अगर ऐसा होता है तो टाटा स्टील और जेएसडब्ल्यू पिछली तिमाहियों में बताए गए अपने क्रमश: 770 और 800 करोड़ के फॉरेक्स नुकसान को रिवर्स कर सकते हैं। अल्यूमीनियम, कॉपर और जिंक उत्पादक जैसे हिंडाल्को, हिंदुस्तान जिंक और नेशनल अल्यूमीनियम की शुध्द बिक्री में 37 फीसदी तक की कमी और और शुध्द मुनाफे में 66 फीसदी की गिरावट देखी जा सकती है।
इंटेग्रेटेड स्टील फर्में जैसे जेएसडब्ल्यू स्टील, सेल और टाटा स्टील की शुध्द बिक्री में मामूली गिरावट आ सकती है जबकि इनके शुध्द मुनाफे में 25-70 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। जिंदल सॉ, जिंदल स्टील ऐंड पावर, महाराष्ट्र सीमलेस, मैन इंड और मोनेट इस्पात जैसी स्टील उत्पादक कंपनियों की बिक्री और मुनाफे में इजाफा देखा जा सकता है।
फार्मा कंपनियों की शुध्द बिक्री में 14 फीसदी की बढत देखी जा सकती है जबकि घरेलू बाजार में जारी मंदी की वजह से इनके शुध्द मुनाफे में 35 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। मोतीलाल ओसवाल के फार्मा एनालिस्ट के मुताबिक डॉ. रेड्डी लैब और रैनबैक्सी को शुध्द हानि हो सकती है। मेरिल लिंच के अनुमान के मुताबिक यह 231 करोड़ रुपए तक हो सकता है।
इस सेक्टर का ऑपरेटिंग प्राफिट मार्जिन 4.35 फीसदी तक कम हो सकता है और इसमें बायोकॉन, ग्लेनमार्क फार्मा, पीरामल हेल्थकेयर, रैनबैक्सी और सन फार्मा के मार्जिन पर दबाव बड़ी वजह होगी। कर्मचारियों पर खर्च और ट्रेड रिसीवेबल्स पर फॉरेक्स नुकसान से कैडिला हेल्थकेयर और टोरेन्ट फार्मा के मार्जिन पर खासा दबाव पड़ सकता है।
मेरिल लिंच रिसर्च के मुताबिक फार्मा सेक्टर में जिन कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर रहेगा उनमें सिपला और डॉ रेड्डीज लैब रहेंगे जबकि रैनबैक्सी और ग्लेनमार्क फार्मा अंडरपर्फार्मर रहेंगे। डॉलर के रियलाइजेशन बढ़ने से फार्मा कंपनियों को फायदा मिलेगा और इनकी शुध्द बिक्री पर इसका असर होगा लेकिन घरेलू बाजार में में इनका प्रदर्शन कमजोर रहने के आसार हैं।
कैपिटल गुड्स और इंजीनियरिंग कंपनियां जैसे भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, क्रॉम्पटन ग्रीव्स, जयप्रकाश एसोसिएट्स और एल ऐंड टी की सेल्स में चौथी तिमाही में 20 फीसदी तक की ग्रोथ देखी जा सकती है। हालांकि अन्य कंपनियां जैसे एबीबी, कमिन्स, एमको, थर्मेक्स और वोल्टमैप की ग्रोथ ऑर्डर कम होने और उन्हे लागू करने में हो रहे विलम्ब से मामूली रहेगी।
शेयरखान के एनालिस्ट के मुताबिक कैपिटल गुड्स कंपनियों की शुध्द बिक्री में गिरावट एक अहम वजह प्राइवेट कैपिटल खर्च और ऑर्डर में कमी आना है। बीएचईएल और एल ऐंड टी के ऑर्डर जहां बढ़े हैं वहीं छोटी और मझोली कंपनियों की ऑर्डर बुक खराब रही है।
कंस्ट्रक्शन कंपनियों की बिक्री में करीब 27 फीसदी तक की ग्रोथ देखी जा सकती है,यह खासकर जीएमआर इंफ्रा, आईवीआरसीएल इंफ्रा., लैन्को इंफ्राटेक, मधुकॉन प्रोजेक्ट्स, पटेल इंजीनियरिंग और सिम्प्लेक्स इंफ्रा. की रेवेन्यू में अच्छी ग्रोथ की वजह से रहेगा। जबकि जीवीके पावर यूनिटी इंफ्रा. की बिक्री में ग्रोथ धीमी रह सकती है।
हालांकि शुध्द मुनाफे में इस तिमाही के दौरान कोई बदलाव रहने की उम्मीद नहीं है और ऑपरेटिंग मार्जिन में आधा फीसदी की कमी इसकी वजह होगी। इसके अलावा कच्चे माल की लागत बढ़ना भी एक वजह है। शुध्द मुनाफे में अच्छी ग्रोथ जीएमआर इंफ्रा., मधुकॉन, प्रतिभा इंड और सिम्प्लेक्स इंफ्रा. की ओर से देखी जा सकती है।
जिन कंपनियों के मुनाफे में गिरावट रहेगी उनमें गैमन इंडिया, आईवीआरसीएल, नागार्जुन कंस्ट्रक्शन और पटेल इंजीनियरिंग रहेंगी। इन कंपनियों पर ब्याज दरों में इजाफे की सबसे ज्यादा मार पड़ेगी, इनका कर्ज ज्यादा है और तरलता के संकट की वजह से दरें काफी ज्यादा हैं।
तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए यह तिमाही बहुत अच्छी साबित हो सकती है, इंवेन्टरी लॉस नहीं होना और ऑटो फ्यूल में ओवर रिकवरी इसकी बड़ी वजह होगी। भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन का शुध्द मुनाफा 2000-4000 करोड़ रुपए के बीच रह सकता है जबकि इंडियन ऑयल कार्पोरेशन का शुध्द मुनाफा 2200-9000 करोड़ के बीच हो सकता है।
चौथी तिमाही में कच्चे तेल की कीमतों में खासा उतार चढ़ाव रहा है नीचे में यह 35 डॉलर प्रति बैरल रहा है जबकि ऊपर में यह 55 डॉलर रहा है, हालांकि तिमाही के दौरान 43.2 डॉलर का औसत रहा है। कच्चे तेल की कम कीमतें घरेलू तेल विपणन कंपनियों औ सरकार के लिए फायदेमंद हैं।
कच्चे तेल की औसत कीमतें जो साल की पहली छमाही में 120 डॉलर प्रति बैरल थी चौथी तिमाही में गिरकर 45 डॉलर प्रति बैरल रह गई हैं जिससे चौथी तिमाही में तेल कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की जरूरतें काफी सुधर गईं। इसके अलावा तीसरी तिमाही और चौथी तिमाही के आखिर 16,100 करोड़ के तेल बान्ड जारी किए गए जिसने तेल विपणन कंपनियों को वर्किंग कैपिटल की जरूरतें पूरी करने में मदद की।
मीडिया कंपनियां, एंटरटेनमेन्ट, न्यूज और प्रिंट के रेवेन्यू में मामूली सुधार देखा जा सकता है जबकि मुनाफे में गिरावट देखी जा सकती है। गिरावट की अहम वजह विज्ञापन से होने वाली कमाई में गिरावट रही है, दरअसल सभी कंपनियों ने अपना विज्ञापन का बजट काफी कम कर दिया है। विज्ञापन पर खर्च कम होने, कार्पोरेट जगत का मुनाफा घटने और प्रतिद्वंद्विता बढ़ने से इन मीडिया कंपनियों के मुनाफे पर खासा असर डाला है।
हालांकि इन कंपनियो के विज्ञापन खर्च के आउटलुक में सुधार आने, कच्चे माल की कीमतें कम होने और कंसॉलिडेशन ने इस सेक्टर को ग्रोथ में मदद की है। मीडिया कंपनियों की विज्ञापन से कमाई चौथी तिमाही में खासकर बैंकिंग, फाइनेंशियल सेवाएं, रियालिटी और ऑटो सेक्टर की विज्ञापन के मद में हुई कटौतियों की वजह से रही।
एफएमसीजी, रीटेल और एजुकेशन सेक्टर पिछले कुछ महीनों में इनके लिए सबसे बड़े विज्ञापनदाता रहे हैं। पिछली तिमाही में प्रिंट कंपनियों के रेवेन्यू में कमी देखी जा सकती है। न्यूजप्रिंट की कीमतों का असर चौथी तिमाही में देखने को नहीं मिलेगा।
इनका रेवेन्यू 2-4 फीसदी तक गिर सकता है, विज्ञापन की कमाई कम होने की कुछ भरपाई अखबारों के बढ़े दाम से हो सकती है। न्यूजप्रिंट की कीमतें कम होने से उनका नुकसान कम करने में भी मदद मिलेगी। हालांकि रुपए की गिरावट ने इनके मार्जिन पर भी दबाव बनाया है।