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‘मौजूदा हालात की जिम्मेदार हैं कई वजहें’

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Last Updated- December 10, 2022 | 11:56 PM IST

वॉकहार्ट के कार्यकारी अध्यक्ष हबील खोराकीवाला कहते हैं कि एक दशक पहले जब वर्ली केमिकल्स से दवा कारोबार की विरासत उन्होंने संभाली, तब से लेकर आज तक कई उतार चढ़ाव देखे हैं।
वह कहते हैं, ‘लेकिन अभी इतिहास का सबसे बुरा वक्त है।’ उनकी कंपनी 3400 करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। बान्द्रा कॉम्प्लेक्स में वॉकहार्ट के दफ्तर में बैठकर खोराकीवाला ने मौजूदा दौर की परेशानियों की चर्चा श्यामल मजूमदार और पी. बी. जयकुमार से की। पेश हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश-
आपकी कंपनी पर कर्ज का बोझ एक खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। इसकी वजह क्या रही?
सबसे पहले तो बाजार में जो अटकलबाजियां चल रही है, उसे दूर करने की कोशिश करता हूं। ये सारे मुद्दे तात्कालिक हैं। बहुत सारी ऐसी कंपनियां हैं, जिसने अधिग्रहण किया और मुसीबत में फंस गए। सभी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी ने मंदी के बारे में सोचा नहीं था। मैंने अपनी जिन्दगी में इससे बुरा दौर कभी नहीं देखा है।
आर्थिक मंदी की मौजूदा दौर से पहले लोगों की सोच अलग थी और भारत दुनियाभर में उभरते हुए बाजार के तौर पर अपनी पहचान बना रहा था। फार्मास्युटिकल का कारोबार भी अन्य कारोबार की तरह ही है, जो तरलता से बच नहीं सकता। बहुत सारे कारकों ने हमें इस दौर में पिछले पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया और समस्या खड़ी हो गई। बैंक ने कर्ज देना कम कर दिया और हमलोगों को मुद्रा की कमी झेलनी पड़ी। 

इस समस्या से निजात पाने में हमें थोड़ा वक्त लगेगा। दूसरी बात कि कर्ज पुरर्संरचना के जरिये पैसे जुटाने की कवायद से पीछे क्यों हटा जाए? जाहिर सी बात है कि इससे विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड और कार्यशील पूंजी जरूरतें तो जरूर हल हो जाएगी। इससे हमारी विस्तार और अधिग्रहण की योजनाओं पर भले ही विराम लग जाए, लेकिन अपनी विकास की गति को बरकरार रखने में तो जरूर मदद मिलेगी।
क्या आप विदेशी अधिग्रहण करने की अपनी आक्रामक योजना के चलते इस स्थिति में पहुंच गए हैं?
हमने जितने भी अधिग्रहण किए, वह अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर जैसे ही हमने आयरलैंड की कंपनी पाइनवुड का अधिग्रहण किया था, हमारे बाजार हिस्से में 5 फीसदी का इजाफा हो गया।
अमेरिका में मॉर्टोन ग्रोव के अधिग्रहण के बाद सितंबर को समाप्त हुए नौ महीने में हमने 222 फीसदी की दर से विकास किया। नेगमा लेबोरेटरीज से हाथ मिलाने की वजह से ही हम यूरोप की सबसे बड़ी भारतीय दवा कंपनी बन पाए। इसलिए मैं नहीं समझता कि हमारी अधिग्रहण रणनीति गलत रही।
आपने वॉकहार्ट हॉस्पिटल की हिस्सेदारी में विनिवेश की बात भी कही है। यानी आप मुख्य कारोबार से हटकर अन्य कारोबार को बेचकर सहायक कंपनी के लिए पुरर्संरचना की योजना बना रहे हैं? क्या अब आपका समय खत्म हो गया?
मैं किसी विशिष्ट बात पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकता, लेकिन हमलोग विभिन्न रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। अभी हमारा प्राथमिक लक्ष्य सीडीआर (अगर बैंकों ने स्वीकार कर लिया) को अमली जामा पहनाना है।
वॉकहार्ट में कुछ हिस्सेदारी बेचना और सहायक कंपनियों की पुनर्संरचना करना या प्रस्तावित सीडीआर योजना पर काम करना कंपनी की रीढ़ को मजबूत करने की कोशिश होगी। हमलोग बहुत सारे सहयोगी से इस बाबत बात कर रहे हैं और कुछ हफ्तों में हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया की तस्वीर साफ हो जाएगी।

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First Published - April 10, 2009 | 6:10 PM IST

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