सरकार उस कंपनी बिल में दोबारा फेरबदल करने पर विचार करने लगी है, जिसे उसने महज दो महीने पहले पेश किया था।
इसके तहत कंपनियों को प्रबंधकों के पारिश्रमिक तय करने की आजादी दी गई थी। कंपनी मामलों का मंत्रालय अब इसी मसले नए सिरे से विचार कर रहा है।
उसके मुताबिक, कंपनी के उच्च अधिकारियों को उसी अनुपात में मुआवजा देना चाहिए, जितना कि विकसित देशों में दिया जाता है।
हालांकि मंत्रालय का कहना है कि इसमें कुछ अंकुश भी लगना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 62 साल पुराने कंपनी कानून, 1956 की जगह इसी साल नया कंपनी बिल, 2008 पेश किया गया है। इसका मकसद कंपनी पर सरकारी नियंत्रण कम करना और उन्हें नौकरशाही से मुक्ति दिलाना है।
कंपनी मामलों के मंत्री प्रेमचंद गुप्ता ने बिानेस स्टैंडर्ड से बताया कि नए कंपनी बिल में प्रबंधकों के पारिश्रमिक तय करने की कंपनी को पूरी आजादी दी गई है, लेकिन अब सरकार चाहती है कि उसमें कुछ प्रावधानों को शामिल किया जाए, यानी उसमें कुछ अंकुश लगाया जाए।
कोई भी कंपनी अपने किसी एक निदेशक को शुद्ध लाभ का 5 फीसदी से ज्यादा भुगतान नहीं कर सकती थी।
हालांकि सभी निदेशकों, जिसमें प्रबंध निदेशक भी शामिल हैं, उन्हें शुद्ध लाभ का 11 फीसदी तक भुगतान किया जा सकता था। इसी बाध्यता को नए बिल से निकाल दिया गया था।
अब मंत्रालय इस तरह के प्रावधान को फिर से बिल में शामिल करने पर विचार कर रहा है। प्रेमचंद गुप्ता ने बताया कि सरकार इस मामले पर विचार कर रही है कि कंपनी को प्रबंधकों के पारिश्रमिक तय करने की पूरी आजादी दी जाए या फिर से बिल में संशोधन किया जाए।
दरअसल, कई कंपनियां घाटे की स्थिति में भी अपने उच्च अधिकारियों को तय पारिश्रमिक देने की गारंटी देती है। ऐसे में कंपनी के सामने समस्या खड़ी हो जाती है।
मंदी की वजह से पश्चिमी देशों में कई वित्तीय संस्थाओं को सरकार ने मदद देकर दिवालिया होने से बचाया है।
इसके तहत संबंधित देशों की सरकारों ने प्रबंधकों के पारिश्रमिक को या तो फ्रीज कर दिया है या फिर उस पर कुछ पांबदी लगा दी है।