पश्चिम एशिया संकट के कारण ईंधन आपूर्ति में आए संकट का असर पूरे भारत में एल्युमीनियम एक्सट्रूजन इकाइयों पर पड़ रहा है, जिससे कारखाने लगभग ठप हो गए, श्रमिक बेरोजगार हो गए और उत्पादन लगभग आधा हो गया है।
दिल्ली स्थित आरएसी एक्सट्रूजन लिमिटेड के मुख्य वित्तीय अधिकारी गौरव मित्तल ने संयंत्र में व्यवधान की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा, ‘एलपीजी की आपूर्ति पूरी तरह ठप होने के कारण हमारी फैक्टरी पिछले सात दिन से बंद है।’ उन्होंने कहा, ‘हमारे 300-500 कर्मचारी बेकार बैठे हैं, उनके पास कोई काम नहीं है।’ उनकी कंपनी प्रतिवर्ष 12,000 टन एल्युमीनियम एक्सट्रूडेड उत्पादों का उत्पादन करती है।
यह संकट द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और पाइपयुक्त प्राकृतिक गैस (पीएनजी) जैसे प्रमुख ईंधनों की उपलब्धता में अचानक आई बाधा के कारण उत्पन्न हुआ। ये ईंधन एल्युमीनियम एक्सट्रूजन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, जो एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें निरंतर ताप से पिघलाने का काम होता है।
एल्युमीनियम एक्सट्रूजन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव अंकुर अग्रवाल ने कहा कि कम से कम 25 एक्सट्रूजन इकाइयां पूरी तरह से बंद हो गई हैं, जबकि लगभग 200 अन्य इकाइयां बेहद कम क्षमता पर चल रही हैं, जिससे कुल उद्योग उत्पादन लगभग 70,000 टन प्रति माह से घटकर लगभग 45,000 टन हो गया है।
यह उद्योग निकाय, जो देशभर में अनुमानित 450-500 इकाइयों में से लगभग 250 कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, का वार्षिक उत्पादन 8-10 लाख टन है, और इसका अनुमानित वार्षिक राजस्व 32,000 करोड़ रुपये है।
इसका असर पूरे देश में देखा जा सकता है। उद्योग जगत के एक संगठन ने कहा कि कई क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों को एलपीजी की आपूर्ति लगभग ठप हो गई है, जबकि पीएनजी के आवंटन में कटौती की गई है। एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र चोपड़ा ने कहा, ‘एलपीजी की आपूर्ति पूरी तरह से बंद हो गई है, और पीएनजी की उपलब्धता 50-80 प्रतिशत तक कम हो गई है। यह परिचालन जारी रखने के लिए बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं है।’
चोपड़ा ने कहा कि एसोसिएशन को गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली-एनसीआर सहित देश भर के औद्योगिक समूहों में स्थित कम से कम 50 कंपनियों से संकट के ईमेल प्राप्त हुए हैं।
ईंधन की कीमतों में भारी वृद्धि से आपूर्ति में आई रुकावट और भी बढ़ गई है। सीमित उपलब्धता के कारण पीएनजी की कीमतों में तेजी से उछाल आई है। बहादुरगढ़ स्थित बालाजी एल्युमीनियम एक्सट्रूशन्स के निदेशक अग्रवाल ने कहा, ‘हमारी गैस की लागत लगभग दोगुनी हो गई है, जो पहले लगभग 52 रुपये प्रति मानक घन मीटर (एससीएम) थी, अब बढ़कर लगभग 90 रुपये हो गई है।’ बालाजी एल्युमीनियम एक्सट्रूशन्स की वार्षिक उत्पादन क्षमता 7,000 टन है। अन्य वैकल्पिक ईंधन भी महंगे हो गए हैं। कुछ भट्ठियों में इस्तेमाल होने वाले कम सल्फर वाले भारी ईंधन (एलएसएचएस) की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है, जबकि भट्ठी के तेल की लागत में भी भारी वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप, जो कंपनियां परिचालन जारी रखने में कामयाब रही हैं, उन्हें लागत के गंभीर दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
अग्रवाल ने कहा, ‘हमारी रूपांतरण लागत में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन बाजार इसे वहन करने के लिए तैयार नहीं है। हमें पूरी वृद्धि खुद वहन करनी पड़ रही है।’
यह संकट सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया संघर्ष ने कच्चे माल की उपलब्धता को भी बाधित कर दिया है। संत एल्युमीनियम प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक अग्रवाल ने कहा, ‘यह सिर्फ ऊर्जा का मामला नहीं है। पश्चिम एशिया संकट के कारण एल्युमीनियम की कीमतों और स्क्रैप की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है।’ राजस्थान के भिवाड़ी स्थित इस कंपनी की वार्षिक उत्पादन क्षमता 18,000 टन है। उन्होंने कहा, ‘हम वर्तमान में केवल 50-60 प्रतिशत क्षमता पर ही काम कर रहे हैं।’
बढ़ती लागत और कमजोर मूल्य निर्धारण क्षमता के बीच इस असंतुलन ने पूरे क्षेत्र में वित्तीय तनाव को और बढ़ा दिया है। गिरते राजस्व के बीच कंपनियां बैंक ऋण चुकाने और निश्चित खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। चोपड़ा ने आगाह करते हुए कहा, ‘बाजार में मांग नहीं है, लागत बढ़ गई है और कंपनियां बैंक ऋण चुकाने के लिए जूझ रही हैं। अगर यह स्थिति 2-3 महीने तक बनी रही, तो उद्योग गंभीर संकट में पड़ जाएगा।’