टायर उद्योग का कहना है कि आयात पर नियंत्रण लगाने के सरकार के प्रयासों से घरेलू उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी और इससे निर्यात में तेजी के साथ साथ रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा। वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय (डीजीसीआईऐंडएस) से प्राप्त आंकड़े के अनुसार वित्त वर्ष 2019 में 42.9 करोड़ डॉलर मूल्य के टायरों का आयात किया गया था। वाहन टायर निर्माताओं के संगठन (एटीएमए) का कहना है कि वित्त वर्ष 2020 के पहले 11 महीनों (वह वर्ष जिसमें आर्थिक मंदी दर्ज की गई है और इसलिए मांग घटी है) में टायर आयात 38.5 करोड़ डॉलर पर रहा।
ज्यादातर आयात चीन से किया गया था। ट्रक और बस रेडियल (टीबीआर), और यात्री कार रेडियल (पीसीआर) दोनों के संदर्भ में इस देश का आयात में 40 फीसदी से ज्यादा का योगदान है। ट्रैक्टर टायर के मामले में, चीन से आयात का योगदान कुल आयात का 75 फीसदी है।
एटीएमए के चेयरमैन के एम मेमन ने कहा, ‘घरेलू निर्माण क्षमता मांग से ज्यादा है और भारत खासकर सभी तरह के टायरों के निर्माण में आत्मनिर्भर बन रहा है। इनमें फाइटर जेट जैसे प्रमुख इस्तेमाल के लिए भी टायर शामिल हैं। ज्यादातर आयात गैर-जरूरी है, और इससे घरेलू निर्माण में क्षमता प्रभावित हो रही है।’
एमआरएफ के चेयरमैन की भी जिम्मेदारी संभालने वाले मेमन ने कहा, ‘ताजा घटनाक्रम उद्योग के लिए सकारात्मक है, क्योंकि इस उद्याग को वाहन क्षेत्र में मंदी और कोविड-19 की वजह से पैदा हुए दबाव से जूझना पड़ रहा है। टायर उद्योग उम्मीद से बेहतर घरेलू उत्पादन और निर्यात वृद्घि की संभावना देख रहा है।’
मेमन ने कहा कि आयात पर प्रतिबंध से पूरी वैल्यू चेन को फायदा होगा, और घरेलू प्राकृतिक रबर के लिए मांग बढ़ेगी।
एटीएमए के अनुसार, टायर आयात के जरिये प्राकृतिक रबर के अप्रत्यक्ष आयात से रबर उत्पादकों का हित प्रभावित हो रहा है। रीप्लेसमेंट और ओईएम सेगमेंट दोनों में कम मांग के साथ वित्त वर्ष 2020 में भारत में कुल टायर उत्पादन 8 फीसदी तक घट गया। भारत में टायर उद्योग के लिए लाभकारी टीबीआर सेगमेंट का कुल राजस्व में 50 फीसदी से ज्यादा का योगदान रहा है। इस सेगमेंट के उत्पादन में 14 प्रतिशत की भारी कमी आई है।
मेमन ने कहा, ‘आर्थिक दबाव की आशंका को देखते हुए टायर उद्योग उत्पादन में और गिरावट का अनुमान जता रहा है। हालांकि आयात पर प्रतिबंधों से इस उद्योग को घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में राहत मिलेगी।’