पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग का असर अब भारत की फैक्टरियों पर भी नजर आने लगा है। बड़ी विनिर्माण कंपनियों से लेकर सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों तक तमाम कंपनियां उत्पादन के मामले में बहुत अधिक संघर्ष कर रही हैं। कुछ को जहां ईंधन में कमी और कच्चे माल के कार्गों में देरी के कारण उत्पादन में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कई अन्य कारोबारी कर्मचारियों के लिए भोजन तक नहीं जुटा पा रहे हैं।
उद्योग जगत के सूत्रों का कहना है कि गैस पर निर्भर कई इकाइयों ने युद्ध से पहले की तुलना में उत्पादन को 30 प्रतिशत तक कम कर दिया है।
जिंदल स्टेनलेस के प्रबंध निदेशक अभ्युदय जिंदल ने कहा कि प्रोपेन/एलपीजी और प्राकृतिक गैस जैसी औद्योगिक गैसों पर स्टेनलेस स्टील निर्माण की भारी निर्भरता के कारण संयंत्रों में कई प्रक्रियाएं प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई हैं। उन्होंने कहा, ‘पारंपरिक इस्पात उद्योग के विपरीत, जो ऊर्जा स्रोत के रूप में बड़े पैमाने पर ब्लास्ट फर्नेस और कोक ओवन गैसों का उपयोग करता है, स्टेनलेस स्टील उद्योग स्क्रैप-आधारित उत्पादन मार्ग अपनाता है, जहां ऐसी गैसें आंतरिक रूप से उत्पन्न नहीं होतीं। ईंधन उपलब्धता की सीमाओं को देखते हुए, हमारे संयंत्र तर्कसंगत क्षमता पर काम कर रहे हैं।’
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक नौवहन मार्गों में व्यवधान के कारण जहाजों का मार्ग बदलना, लंबी ट्रांजिट अवधि और कार्गो में देरी हो रही है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला और मार्जिन पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, ‘हम सराहना करते हैं कि सरकार इस मामले को पूरी तरह समझ रही है और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए ईंधन आवंटन को सक्रिय रूप से प्राथमिकता दे रही है। औद्योगिक प्रोपेन/एलपीजी और प्राकृतिक गैस के लिए आवंटन प्रतिशत पर स्पष्टता, साथ ही नियमित आपूर्ति का आश्वासन, स्टेनलेस स्टील उद्योग के लिए संचालन की योजना बनाने और उन्हें अनुकूलित करने में महत्त्वपूर्ण होगा।’ उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्पष्टता नहीं होती है, तो पूरे उद्योग में एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ेगा, जिसकी गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये मुद्दे कितनी जल्दी हल होते हैं।
पारंपरिक इस्पात उद्योग के व्यापक परिप्रेक्ष्य में, दो प्रमुख इस्पात उत्पादकों ने हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि डाउनस्ट्रीम संचालन पर सीमित प्रभाव पड़ा है।
मुरुगप्पा समूह की कार्बोरंडम यूनिवर्सल लिमिटेड (सीयूएमआई) के एरोस्पेस और रक्षा विभागों के प्रमुख सुब्बु वेंकटचलम ने कहा कि उनकी कंपनी को उत्पादन पर गैस की कमी का सीधा असर नहीं पड़ रहा है, क्योंकि आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है और कच्चे माल का आंतरिक निर्माण भी होता है। उन्होंने कहा, ‘हम कुछ परिचालनों के लिए विद्युत ऊर्जा पर स्विच करने की संभावना तलाश रहे हैं।’
इसी समय, एमएसएमई इकाइयां अधिक दबाव महसूस कर रही हैं। उदाहरण के लिए चेन्नई के बाहरी इलाके अंबात्तूर का मामला लें, जो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा लघु उद्योग क्षेत्र है और जिसमें 1,800 से अधिक औद्योगिक इकाइयां हैं। सूत्रों के अनुसार, इस क्लस्टर में केवल लगभग 10 प्रतिशत इकाइयां ही अपनी परिचालन गतिविधियों के लिए सीधे गैस पर निर्भर हैं, लेकिन ये इकाइयां बाकी बड़ी संख्या में इकाइयों को सेवाएं प्रदान करती हैं, जिससे क्षेत्र में परिचालन अवरोध पैदा हो रहा है।
किर्लोस्कर, सुगुना, शार्प और सीआरआई पंप्स जैसी जल पंप कंपनियों की प्रमुख आपूर्तिकर्ता कंपनी ऐवन सील्स के प्रबंध निदेशक और अंबात्तूर इंडस्ट्रियल एस्टेट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष ए.एन. गिरीशन का कहना है, ‘हीटिंग का उपयोग करने वाली इकाइयां, जैसे फाउंड्री और कास्टिंग इकाइयां, वाणिज्यिक गैस की कमी के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं और कुछ आंशिक रूप से काम कर रही हैं। क्षेत्र की बाकी इकाइयां उन पर निर्भर हैं।’
पश्चिम बंगाल के हावड़ा की फाउंड्री और कास्टिंग बेल्ट में, कुछ कंपनियां गैस की कमी से प्रभावित हुई हैं। गोविंद स्टील और दिनेश ब्रदर्स नामक दो फाउंड्री इकाइयों के मालिक दिनेश सेकसरिया ने कहा कि गैस की कमी के कारण निर्यात कास्टिंग का उत्पादन लगभग 10 प्रतिशत तक गिर गया है। उन्होंने कहा, ‘हम उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अगर यही स्थिति बनी रहती है तो निर्यात कास्टिंग के उत्पादन स्तर में गिरावट 20 प्रतिशत तक जा सकती है।’
इकाइयां सांचों को गर्म करने के लिए वाणिज्यिक गैस का उपयोग करती हैं। सेकसरिया लगभग 300 श्रमिकों को रोजगार देते हैं। जिनमें से लगभग 100 फाउंड्री कैंटीन में भोजन करते हैं। रसोई गैस की कमी ने उन्हें लगभग रातोरात इंडक्शन अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है। एस्सेन इंटरनैशनल के मेंटर रवि सहगल, जो कास्ट आयरन उत्पादों के निर्यातक हैं, ने कहा कि फैक्टरी में श्रमिकों के लिए खाना पकाने वाली गैस की आपूर्ति को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा, ‘हमारे पास उपलब्ध गैस अधिकतम दो सप्ताह तक चल सकती है। ठेकेदार और कंपनी को संसाधनों को मिलाकर विद्युत विकल्प तलाशने होंगे।’
होसुर में, एल्केम ऑटो एंसिलरीज के अध्यक्ष और होसुर इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के नेता अरविंद एम. अधी ने कहा कि कई गैस-निर्भर इकाइयां अपने पूर्व उत्पादन स्तर के 70 प्रतिशत पर चल रही हैं। उन्होंने कहा, ‘यदि यह जारी रहा, तो देशभर के उद्योग खिलाड़ियों को गंभीर उत्पादन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।’
लायम ग्रुप के अध्यक्ष जी. रमेश, जो दक्षिण भारत की 60 कंपनियों को कुशल जनशक्ति उपलब्ध कराने वाले प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं, ने कहा कि क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अभी तक इस संकट से प्रभावित नहीं हुई हैं।
बड़े इस्पात संयंत्रों जैसे टाटा स्टील और राउरकेला स्टील प्लांट (आरएसपी) के उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि एलपीजी की कमी ने पहले ही उन्हें श्रमिक कैंटीनों में रसोई संचालन को तर्कसंगत बनाने के लिए मजबूर कर दिया है, जहां हर दिन हजारों भोजन परोसे जाते हैं।
ओडिशा में औद्योगिक इकाइयां, विशेष रूप से इस्पात, एल्युमीनियम, स्पंज आयरन, खाद्य प्रसंस्करण, समाचार पत्र और विनिर्माण क्षेत्रों में, ने कहा कि उनकी कैंटीन संचालन के मामले में दबाव में हैं क्योंकि वाणिज्यिक एलपीजी सिलिंडरों की यदि नई आपूर्ति नहीं आती है तो गैस केवल एक या दो दिन तक ही चल सकती है।
आरएसपी की जनसंपर्क महाप्रबंधक (जीएम) अर्चना सतपथी ने कहा कि इस्पात संयंत्र के अंदर कम से कम 23 कैंटीन संचालित हो रही हैं और इन्हें निजी एजेंसियों द्वारा चलाया जाता है। उन्होंने कहा, ‘उन्हें पहले ही गैस उपयोग को कम करने और मेन्यू को सरल बनाने का निर्देश दिया गया है। लंबे समय तक पकाने या भारी तलने वाले आइटमों को अस्थायी रूप से कम कर दिया गया है। यदि आपूर्ति की स्थिति अगले कुछ दिनों में बेहतर नहीं होती है, तो हमें वैकल्पिक व्यवस्थाओं की तलाश करनी पड़ सकती है।
टाटा स्टील के कलिंग नगर यूनिट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कंपनी ने मेन्यू को कम करना शुरू कर दिया है और यह भी देख रही है कि वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जाएं ताकि श्रमिकों के लिए भोजन आपूर्ति बाधित न हो।
अधिकांश मामलों में, फैक्टरी इकाइयों की कैंटीनें अब लकड़ी, कोयला और बिजली का सहारा ले रही हैं। संकट जारी रहे या न रहे, कंपनियां संकेत दे रही हैं कि वे भविष्य में ईंधन की कमी के लिए हमेशा एक वैकल्पिक योजना तैयार रखेंगी।