फाइजर और ग्लैक्सोस्मिथलाइन जैसी बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां भी अब देसी दवा निर्माता निर्माताओं की कमाई के सबसे बड़े जरिये, जेनरिक दवाओं के कारोबार में उतरने की तैयारी बड़े स्तर पर कर रही हैं।
जेनरिक या रिवर्स इंजीनियरिंग से तैयार की गईं ये दवाओं न सिर्फ रैनबैक्सी, डॉ. रेड्डीज लैब व सन फार्मा जैसी देसी दवा कंपनियों, बल्कि टेवा, सैंडोज और मायलान जैसी विदेशी दवा कंपनियों की आय का प्रमुख स्रोत है।
दुनिया की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी फाइजर ने भी अभी हाल ही में हैदराबाद की अरबिंदो फार्मा के साथ समझौता किया है। इसके तहत वह अमेरिका और यूरोप में अरबिंदो की ऑफ पेटेंट दवाओं की मार्केटिंग करेगी। यह कंपनी खुद भी जेनरिक दवाओं के निर्माण में कूदने की योजना बना रही है।
एक बड़ी योजना के तहत कंपनी लाइसेंस के आधार पर दवाओं के निर्माण और जेनरिक दवाओं को बनाने वाली कंपनियों के अधिग्रहण की योजना बना रही है। फाइजर की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी, ग्रीनस्टोन पहले से ही उसकी अपनी ऑफ पेटेंट दवाओं की मार्केटिंग कर रही है।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी ग्लैक्सोस्मिथलाइन भी अब दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी एस्पेन फार्माकेयर को खरीदने की कोशिश में जुटी हुई है। चर्चा तो यह भी है कि उसने पीरामल हेल्थकेयर को खरीद लिया है। खबरों की मानें तो फ्रेंच दवा निर्माता सैनोफी-अवंतिस ने भी चेक जेनरिक दवा निर्माता कंपनी, जेंटिवा को दो अरब डॉलर चुकाकर खरीद लिया है।
यह कंपनी भी पीरामल हेल्थकेयर को खरीदने की दौड़ में शामिल है। भारत की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी, रैनबैक्सी को पिछले साल जापानी दवा निर्माता कंपनी दाइची सैंक्यो ने खरीद लिया था। सैंडोज पर अब नोवार्तिस का कब्जा है। सैंडोज, जेनरिक दवाओं के बाजार में इजरायल की टेवा फार्मास्युटिकल्स के बाद सबसे बड़ी खिलाड़ी है।
इंटरनैशनल जेनरिक फार्मास्युटिकल अलायंस के पूर्व अध्यक्ष और इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस के मौजूदा महासचिव डीजी शाह का कहना है, ‘अब बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों को भी पता चल गया है कि आगे चल विकासशील बाजार ही मुनाफे दे सकते हैं। इन बाजार में जेनरिक दवाओं का ही बोलबाला है। जहां अमेरिका और यूरोप में बाजार सिर्फ एक से दो फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है, तो वहीं विकासशील मुल्कों के बाजार की विकास की रफ्तार 12-14 फीसदी की है।’
जर्मनी की मार्क केजीएए भी अधिग्रहण के लिए एक मजबूती भारतीय कंपनी की तलाश में है। दुनिया की इस सबसे पुरानी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी की योजना अगले चार सालों में भारतीय बाजार से 3200 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई करने का है। इस बाबत कुछ ही दिनों पहले मार्क इंडिया के प्रबंध निदेशक मार्क जिक ने बिजनेस स्टैंडर्ड को जानकारी दी थी।