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डीएचएफएल का ऋण समाधान

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Last Updated- December 12, 2022 | 9:41 AM IST

दो साल पहले जनवरी 2019 में खोजी समाचार साइट कोबरापोस्ट ने इस खुलासे से भारतीय वित्तीय जगत को हिलाकर रख दिया था कि डीएचएफएल के प्रवर्तकों वधावन बंधुओं ने कंपनियों से लेकर विभिन्न प्रवर्तक संस्थाओं में 31,000 करोड़ रुपये लगाने का घपला किया है। कई मुखौटा कंपनियों के निर्माण के जरिये इस धन की निकासी की गई थी।
कंपनी की प्रारंभिक प्रतिक्रिया में इससे इनकार किया गया था, लेकिन जैसा कि इसके बाद की जांच से पता चला है वधावन बंधुओं न केवल आवास ऋण उपलब्ध कराने वाली इस कंपनी की नकदी छीन ली, बल्कि यह पूरा काम सालों तक चलता रहा, जबकि विनियामक और उसके ऑडिटर इस घोटाले का पता लगाने में असमर्थ रहे।
दिसंबर 2019 में कंपनी को दिवालिया अदालत में भेजे जाने तक इस पर उत्तर प्रदेश में भविष्य निधि धारकों और सावधि जमा धारकों तथा कई उधारदाताओं का तकरीबन 90,000 करोड़ रुपये का बकाया था। डीएचएफएल में कर्मचारी ट्रस्टों द्वारा लगभग 4,100 करोड़ रुपये की भविष्य निधि (पीएफ) की राशि फंसने के विरोध में उत्तर प्रदेश राज्य के 45,000 बिजली कर्मचारी सड़कों पर उतर आए। तब उत्तर प्रदेश सरकार ने डीएचएफएल और यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) द्वारा किए गए निवेश के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो की जांच का आदेश दिया था।
डीएचएफएल के इस पतन ने न केवल ऑडिट करने वाली भारतीय कंपनियों की खामियों को उजागर किया, बल्कि इसे ऊंची रेटिंग देने वाली भारतीय रेटिंग कंपनियों की कमियों को भी सामने ला दिया।
ऑडिट करने वाली कंपनी केपीएमजी ने नवंबर 2019 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा कि डीचएफएल के प्रवर्तकों ने डीएचएफएल से निकालकर अन्य विभिन्न संस्थाओं में 20,000 करोड़ रुपये की राशि लगाई, जबकि राशि के अंतिम उपयोग पर कोई उचित प्रविष्टि भी नहीं थी। भारतीय रिजर्व बैंक के एक आदेश के बाद डीएचएफएल को ऋण समाधान के लिए एनसीएलटी के पास भेज दिया गया था।
मई 2020 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने डीएचएफएल के प्रवर्तकों कपिल और धीरज वधावन को येस बैंक के सह-संस्थापक राणा कपूर और अन्य लोगों के खिलाफ धन शोधन जांच के संबंध में गिरफ्तार कर लिया। दरअसल वे पहले से ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद जेल में थे जो धन शोधन मामलों की भी जांच कर रही है।
फरवरी 2020 में ऋणदाताओं द्वारा कंपनियों के लिए बोली मांगी जाने के बाद उन्हें डीएचएफएल के ऋण पोर्टफोलियो के लिए 24 रुचि पत्र प्राप्त हुए थे। बोली लगाने वालों में केकेआर, बेन कैपिटल, आर्किल और ओकट्री भी शामिल थी जिन्होंने बिक्री के सभी तीन पोर्टफोलियो के लिए बोली लगाई थी। कुछ अन्य कंपनियों ने केवल खुदरा पोर्टफोलियो और स्लम पुनर्विकास ऋण पोर्टफोलियो के लिए ही बोली लगाई थी। लेकिन वित्तीय बोली आमंत्रित किए जाने के वक्त तक केवल चार बोलीदाता ही मैदान में रह गए थे। अंतिम बोलीदाता थे पीरामल समूह, अदाणी समूह, अमेरिका स्थित ओकट्री और एससी लोवी।
बोली लगाए जाने के पहले दौर में ओकट्री ने 20,000 करोड़ रुपये (स्थगित भुगतानों में ब्याज सहित 8,000 करोड़ रुपये समेत) में पूरी कंपनी हासिल करने की पेशकश की थी, जबकि पिरामल समूह ने केवल खुदरा बहीखाते के लिए 15,000 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। अदाणी समूह केवल निर्माण संबंधी वित्त और स्लम पुनर्विकास क्षेत्र के बहीखाते के लिए उत्सुक था और उसने लगभग 3,000 करोड़ रुपये की पेशकश की थी। एससी लोवी का कहना था कि वह केवल निर्माण सबंधी वित्त के बहीखातों को लेना चाहती है।
अब तक की कहानी
जनवरी 2019 : कोबरापोस्ट ने कहा कि डीएचएफएल के प्रवर्तकों ने गलत तरीके से धन निकासी की
नवंबर 2019 : भारतीय रिजर्व बैंक ने डीएचएफएल केनिदेशक मंडल को हटा दिया और आर सुब्रमण्यकुमार को प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया
दिसंबर 2019 : डीएचएफएल द्वारा बैंक ऋण का भुगतान करने में असफल होने के बाद एनसीएलटी ने इसके खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया का आदेश दिया
जनवरी 2020 : ऋणदाताओं ने डीएचएफएल और/अथवा इसके बहीखातों के लिए रुचि पत्र आमंत्रित किया
फरवरी 2020 : डीएचएफएल के लिए 24 कंपनियों ने रुचि पत्र जमा कराए
अक्टूबर 2020 : ओकट्री ने पूरी कंपनी के लिए सबसे ज्यादा बोली लगाई
नवंबर 2020 : अदाणी ने पूरी कंपनी के लिए सबसे ज्यादा 31,000 करोड़ रुपये की पेशकश की
दिसंबर 2020 : बोली के एक और दौर की हुई मांग, पीरामल की पेशकश रही सबसे अधिक

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First Published - January 15, 2021 | 11:25 PM IST

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