वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में छंटनी के बादल मंडरा रहे हैं, लेकिन घरेलू सीमेंट निर्माता उद्योग अब भी इस फेहरिस्त में शामिल नहीं है।
हालांकि एसीसी कंक्रीट पहले ही अपने कुल कर्मियों में से लगभग 25 प्रतिशत की छंटनी कर चुकी है, बावजूद इसके सीमेंट निर्माता कंपनियों का कहना है कि हम छंटनी का विचार नहीं बना रहे, क्योंकि उद्योग में मंदी है ही नहीं।
औसतन 10 लाख टन सालान क्षमता वाले सीमेंट संयंत्र के लिए 400 कुशल कर्मियों की जरूरत होती है। मौजूदा समय में उद्योग जगत में 70,000 कर्मी लेगे हुए हैं और अगले दो वर्षों में उद्योग में क्षमता विस्तार को देखते हुए 43,000 और कुशल कर्मियों की जरूरत होगी।
अंबुजा सीमेंट्स के प्रबंध निदेशक ए एल कपूर का कहना है, ‘सीमेंट उद्योग में कर्मियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। इसमें कभी भी छंटनी नहीं हुई है। कर्मियों की कुल लागत बेचने योग्य सीमेंट की मात्रा के लगभग 3.5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक होती है। इसलिए छंटनी से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला।’
उद्योग जगत मौजूदा पंच वर्षीय योजना (2007-12) के दौरान लगभग 10 करोड़ टन और अपनी क्षमता बढ़ाने में लगा हुआ है। सीमेंट निर्माता संघ के अध्यक्ष एच एम बांगड़ का कहना है कि इन योजनाओं में ज्यादातर नई परियोजनाएं हैं, जिनके लिए पूरा नया ढांचा चाहिए।
ऐसे समय में जब उद्योग विस्तार के बड़े दौर से गुजर रहा हो तो भला कोई कैसे छंटनी कर सकता है।
बांगड़ जो श्री सीमेंट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक भी हैं, उनका कहना है, ‘दूसरे क्षेत्रों के विपरीत सीमेंट की मांग में कोई मंदी नहीं है और बिक्री में इजाफा हुआ है। मैं मानता हूं कि स्थिति बुरी जरूर है, लेकिन यह सीमेंट क्षेत्र के लिए इतना भी बुरा नहीं है कि उद्योग को छंटनी करनी पड़े।’
डालमिया सीमेंट के मुख्य कार्याधिकारी टी वेंकटेशन ने भी छंटनी की आशंका से इनकार किया। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है कि जब संयंत्र बंद होंगे, तभी छंटनी की आशंका है। उनका कहना है, ‘मौजूदा समय में कोई भी संयंत्र बंद नहीं हो रहा और न ही निकट भविष्य में ऐसी को आशंका है, जबकि संयंत्रों के इस्तेमाल में कमी जरूर आई है।’
मौजूदा समय में बुनियादी ढांचों और आवासीय क्षेत्र में चल रही मंदी का असर सीमेंट उद्योग पर भी दिखाई दे रहा है। सीमेंट निर्माताओं के संघ के अक्टूबर में आंकड़ों के अनुसार उद्योग की बिक्री इस माह में 10.02 करोड़ टन है, जबकि पिछले वर्ष में अक्टूबर तक बिक्री 9.43 करोड़ टन थी।
अभी तक तो किसी ने भी उत्पादन कम करने की पहल नहीं की है, लेकिन संयंत्रों का इस्तेमाल सितंबर तिमाही में घटकर 82 प्रतिशत हो गया है।