मंदी के ब्रेक से भले ही ऑटोमोबाइल उद्योग की गाड़ी जाम हो गई हो लेकिन गाड़ियों पर ही आधारित कैब इंडस्ट्री अभी भी सालाना 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी रफ्तार से सरपट भागी जा रही है।
आलम यह है कि पिछले चार साल में ही महानगरों में कैब की संख्या (सवारी और कंपनी लीज पर आधारित कैब) 8 हजार से बढ़कर 25 हजार पहुंच गई है। राष्ट्रमंडल खेलों के तहत इनकी मांग में बढ़ोतरी के चलते एनसीआर में तो इनकी संख्या 32 से 35 हजार तक पहुंच जाने की पूरी उम्मीद है।
30 से 35 फीसदी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ रहे रोजगार वाली इस इंडस्ट्री में फिलहाल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और चंडीगढ़ जैसे शहरों में 70 से 80 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है।
पिछले तीन सालों में इस कारोबार से जुड़ी कंपनियों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो गई है। इनमें ईजी कैब, मेरु कैब, रेडियो कैब, मेगा कैब और क्विक कैब जैसी कंपनियां प्रमुख हैं, जो अपनी सुविधाएं 7.50 से लेकर 15.50 रुपये प्रति किलोमीटर की दर पर यह सुविधा मुहैया करा रही हैं।
दिल्ली कैब के सीईओ नीरज कुमार का कहना है कि पिछले एक साल में पूरी कैब इंडस्ट्री का बाजार 15 से 20 फीसदी तक बढ़ा है। राष्ट्रमंडल खेलों के समय तो बाजार में 25 फीसदी तक की और बढ़ोतरी होने की भी उम्मीद है।
नीरज बताते है कि मंदी के चलते कंपनियों द्वारा कॉस्ट कंटिग की नीति अपनाए जाने के कारण छोटी अवधि के लिए हमारा कारोबार 10 से 15 फीसदी प्रभावित तो हुआ है। लेकिन लंबी अवधि के तौर पर यह कारोबार अभी भी 25 फीसदी की सालाना दर से बढ़ोतरी कर रहा है।
ईजी कैब नाम से सेवाएं देने वाली कंपनी कार्सऑनरेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव के. विज का कहना है, ‘लोग निजी कैब वाजिब दामों पर बुक करके जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
हमो उपभोक्ताओं की संख्या दो महीने में 25 फीसदी बढ़ गई है। अभी हम अपनी सेवाओं को दिल्ली, बेंगलूरु, हैदराबाद और चंडीगढ़ जैसे शहरों में संचालित कर रहे हैं।’
सालाना 30 फीसदी बढ़ोतरी नौकरियों की भी बरसात
चार साल में महानगरों में कैब की संख्या 8 हजार से बढ़कर 25 हजार हुई
नई नौकरियों की रफ्तार में भी 35 फीसदी की बढ़ोतरी
बड़ी तादाद में कारोबार में उतरीं कंपनियां