आर्थिक मंदी ने अमेरिका की लघु एवं मझोली कंपनियों को भारत में व्यवसाय करने के अवसरों की तलाश करने को बाध्य कर दिया है।
अमेरिकी कंपनियां यहां अच्छे अवसर देख रही हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि भारत की सालाना विकास दर औसतन 7 फीसदी से अधिक है और इसका लगभग 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाला मध्य वर्ग तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही खरीद शक्ति और अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं के प्रति आकर्षण में भी इजाफा हो रहा है।
एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक, अमेरिका के उपाध्यक्ष रेमंड जे एलीज ने नई दिल्ली में एक सम्मेलन के दौरान अनौपचारिक रूप से कहा, ‘भारत जैसी तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाएं हमारे लिए अधिक विकास वाले बाजार हैं, क्योंकि अमेरिका में बिक्री में गिरावट आई है।’
यूएस कमर्शियल सर्विस के सहयोग से फेडएक्स के नेतृत्व में इस सार्वजनिक-निजी पहल के जरिये एक 15 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल मध्यम आकार वाली भारतीय कंपनियों के साथ कारोबारी गठजोड़ की संभावनाओं का पता लगाने के लिए भारत आया।
इस प्रतिनिधि मंडल में ऑटोमोबाइल, स्वास्थ्य, इलेक्ट्रिक उपकरण, रसायन, शिल्पकार और ऊर्जा उत्पादों जैसे सेवा क्षेत्रों से प्रतिनिधि शामिल हैं। अमेरिका के सहायक वाणिज्य मंत्री एवं विदेश वाणिज्य सेवा के महानिदेशक इसरायल हर्नांडीज ने कहा, ‘नए अमेरिकी उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और सेवाओं के लिए भारत भरपूर संभावनाओं के साथ एक तेजी से बढ़ता बाजार है।’
प्रतिनिधि मंडल देश में सभी प्रमुख आर्थिक केंद्रों में अमेरिकी व्यापार को लोकप्रिय बनाने के लिए नई दिल्ली, हैदराबाद और मुंबई का दौरा किया। इसके अलावा यह प्रतिनिधि मंडल अमेरिकी कारोबारियों के साथ खरीदारी के नए अवसरों की तलाश करने में भारतीय कंपनियों की मदद करेगा।
हर्नांडीज ने कहा, ‘अमेरिका-भारत व्यावसायिक संबंधों को मजबूत बनाने और दोनों देशों के बीच निष्पक्ष एवं दोतरफा व्यापार के लिए यह एक अहम कदम है।’ भारत अमेरिका के 20 सबसे बड़े व्यापार भागीदारों में शुमार है और यह अमेरिका के लिए 16वां सबसे बड़ा निर्यात बाजार है।
अनुमानों के मुताबिक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 4.2 अरब डॉलर का है और 2012 तक इसके बढ़ कर 60 अरब डॉलर हो जाने की संभावना है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 2008 की पहली छमाही में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 21 फीसदी का इजाफा हुआ है।