पश्चिम एशिया संकट के बीच केंद्र सरकार यूरिया क्षेत्र में नया निवेश लाने के लिए कुछ संशोधनों के साथ 2012 की नई निवेश नीति के विस्तार को अंतिम रूप दे रही है। सूत्रों ने बताया कि इस नीति का उद्देश्य 7 नए संयंत्रों (ब्राउनफील्ड और ग्रीनफील्ड दोनों) की स्थापना के माध्यम से अगले 8 वर्षों में भारत के घरेलू यूरिया उत्पादन को लगभग 90 से 100 लाख टन तक बढ़ाना है।
प्रत्येक यूरिया संयंत्र की अनुमानित वार्षिक उत्पादन क्षमता 12.7 लाख टन प्रस्तावित है। शुरुआती रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि प्रस्तावित 7 संयंत्रों में से 3 निजी क्षेत्र, 3 सरकारी क्षेत्र (राज्य सरकारों सहित) और 1 सहकारी क्षेत्र द्वारा स्थापित किए जाएंगे।
अगर यह माना जाए कि आयातित यूरिया का औसत सालाना मूल्य 345 डॉलर प्रति टन है तो इससे सरकारी खजाने की सालाना 10,500 करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी (रूढ़िवादी अनुमानों के अनुसार) की बचत अनुमान है। सूत्रों के अनुसार नई नीति में उत्पादन शुरू होने की तारीख से 8 साल तक इकाइयों से बाई बैक की गारंटी दी गई है।
सूत्रों का कहना है कि नई नीति के मुताबिक ग्रीनफील्ड श्रेणी के लिए लगभग 11,000 करोड़ रुपये और ब्राउनफील्ड श्रेणी के लिए 9,000 करोड़ रुपये की अनुमानित परियोजना लागत रखी गई है, जो एक डॉलर की कीमत 90 रुपये मानकर रखी गई है।
इस नीति को ऐसे समय में अंतिम रूप दिया जा रहा है, जब पश्चिम एशिया संकट के कारण आपूर्ति संबंधी बाधाओं की वजह से यूरिया की मौजूदा वैश्विक दरों में 112 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है और यह लगभग 925 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है।
आपूर्ति के संकट के कारण न सिर्फ यूरिया, बल्कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की कीमत भी बढ़ी है, जिसका यूरिया संयंत्रों में इस्तेमाल होता है। फरवरी के अंत में लगभग 10.4 डॉलर प्रति मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट से बढ़कर मार्च की शुरुआत में लगभग 25.4 डॉलर प्रति मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद मई की शुरुआत में यह 18 डॉलर प्रति मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट पर है।
भारत वर्तमान में अपनी वार्षिक यूरिया मांग का लगभग 26 प्रतिशत आयात करता है, जिससे पश्चिम एशिया संकट के कारण राजकोष पर भारी बोझ पड़ रहा है।