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ज्यादा अनाज के लिए एक और हरित क्रांति की दरकार

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Last Updated- December 07, 2022 | 3:02 PM IST

चीन के प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ ने हाल ही में कहा था कि उनके देश को अनाज के संदर्भ में चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि चीन के भंडार में वास्तव में कितना अनाज है?


प्रचलित अनुमानों के मुताबिक चीन का अनाज भंडार लगभग 2,000 लाख टन का है जो देश की सालाना उत्पादन का 30 प्रतिशत से अधिक है। इस प्रकार देखा जाए तो चीन का सुरक्षित भंडार फूड ऐंड एग्रीकल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) द्वारा सुझाए गए आदर्श भंडार से कहीं अधिक है।

फूड ऐंड एग्रीकल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने किसी देश को आदर्श खाद्यान्न भंडार के तौर पर सालाना खपत का 18 प्रतिशत रखने का सुझाव दिया था। लेकिन इस प्रकार के संदेह भी व्यक्त किए जा रहे हैं कि चीन के कुछ इलाकों ने बाद में लाभ कमाने के खयाल से यह जानकारी दी हो कि उनके पास अनाज का भंडार अधिक है। ये बातें निराधार नहीं हैं।

उदाहरण के तौर पर, ओईसीडी तथा एफएओ द्वारा संयुक्त तौर पर लिखे गए एग्रीकल्चरल आउटलुक 2008 की रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य पदार्थो की कीमतों में हुई 23.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने चीन को महंगाई के मामले में सबसे अधिक प्रभावित किया है। खाद्य पदार्थों में हुई बढ़ोतरी से प्रभावित होने वाले तीन उभरते देशों में चीन, केन्या और श्रीलंका शामिल है। चीन ने खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित करने का भरसक प्रयास किया उसके बावजूद स्थिति कुछ ऐसी रही।

चीन की खाद्य परिस्थितियां निश्चित ही वैसी नहीं है जैसा कि वह विश्व को विश्वास दिलाना चाहता है। नहीं तो फिर यह देश बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के खयाल से अनाज के निर्यात को कम करने के लिए कर और कोटा का सहारा क्यों लेती? हांगकांग में अनाजों की आपूर्ति अबाधित तौर पर जारी है लेकिन आयातकों को यह भरोसा दिलाना होता है कि वे लाभ कमाने के लिए उसका पुनर्नियात नहीं करेंगे। आधिकारिक मीडिया रिपोर्ट यह दर्शाते हैं कि निर्यात पर लगे अंकुश से खाद्य पदार्थों के अवैध कारोबार को प्रोत्साहन मिल सकता है।

अनाज की कमी और उनके मूल्यों में वृध्दि से चिंतित चीन अब अनाज के पर्याप्तता का स्तर बढ़ा कर 95 प्रतिशत करना चाहता है। लेकिन पेइचिंग को इस बात पर भी विचार करना होगा कि अतिरिक्त आर्थिक प्रयासों के माध्यम से बढ़ाया जाने वाला प्रतिबंध तर्कसंगत है क्योंकि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के एजेंडा में खाद्य पदार्थों के खुले कारोबार को शीर्ष स्थान पर रखा गया है। चीन का ध्यान पशुओं और पॉल्ट्री पर अधिक होना चाहिए क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी में इसका योगदान प्रमुख है।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन कहते हैं कि वर्तमान वैश्विक खाद्य संकट मुख्य रुप से मांग से प्रेरित है- मार्क्सवादी यहां सुझावों से छटपटा रहे होंगे- अंतत: यह समाप्त हो जाएगा। जब ऐसा हो जाता है तो वैश्विक अनाज के कारोबार में देखे गए असंतुलन और विकृति का भी अंत होगा। वास्तविक आशंका यह है कि अगर अनाज की कमी वाले देशें की जरुरतों की पूर्ति बड़े पैमाने पर केवल अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा किया जाना जारी रहता है, जहां किसानों को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के तत्वाधान में लाये गए परिवर्तनों के बावजूद छूट देने का सिलसिला जारी रहता है, तो कारोबारी विकृति बनी रहेगी।

अर्थशास्त्र का मूल सिध्दांत यह है कि अगर किसी कमोडिटी, अभी के प्ररिप्रेक्ष्य में अनाज, के मूल्य में बढ़ोतरी होती है तो इससे उत्पादक आपूर्ति बढ़ाने के लिए उत्साहित होंगे। अनाज की कीमत अधिक होने से किसान खेती की लागत अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और खाद के रुप में बढाएंगे। सिंचाई के  क्षेत्र के विस्तार करने पर भी शयद विचार किया जाए। हालांकि, खेती के साथ एक समस्या है। औद्योगिक उत्पादों की तरह कृषि के उत्पादन में अचानक बढ़ोतरी नहीं की जा सकती है।

विश्व के अर्थशास्त्रियों और कृषि विशेषज्ञों का मत है कि विश्व को एक और हरित क्रांति की आवश्यकता है। पहली हरित क्रांति हम लोगों ने सन् 1960 में देखी थी। लेकिन हरित क्रांति हो इसके लिए आवश्यक है कि अधिक सक्षम बीज विकसित किए जाएं। हालांकि इस प्रक्रिया में समय के साथ-साथ पूंजी लगाने की जरूरत होगी। इसलिए, यह समय है जब प्रमुख खाद्य उत्पादक देश कृषि संबंधी शोध के लिए अपेक्षाकृत अधिक कोष की व्यवस्था करें।

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First Published - August 4, 2008 | 11:37 PM IST

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