कर्नाटक के इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी मंत्री और ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री प्रियांक खरगे का कहना है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने संबंधी राज्य सरकार के हालिया प्रस्ताव का उद्देश्य बच्चों के लिए वेब की दुनिया को विनियमित करना है। अभीक दास से खास बातचीत में उन्होंने इस क्षेत्र को विनियमित करने की चुनौतियों के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि बच्चों को इसके नुकसान से बचाने के लिए सामूहिक प्रयास होना चाहिए। मुख्य अंश:
आपकी सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। इस पर आप क्या कहेंगे?
हमारा इरादा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का नहीं बल्कि बच्चों के लिए उसे विनियमित करने का है। समस्या यह है कि बच्चे स्क्रीन पर काफी समय बिता रहे हैं और उनके ध्यान न देने के बारे में काफी शिकायतें मिल रही हैं। चाहे सोशल मीडिया हो या गेमिंग ऐप अथवा टेलीविजन, मुझे लगता है कि हर माता-पिता को अपने बच्चे के स्क्रीन टाइम के बारे में चिंता होती है। बच्चे सोशल मीडिया के नकारात्मक पक्ष से जुड़ रहे हैं और उनका शोषण हो रहा है। लोग सामाजिक कलंक के कारण बाहर नहीं आ पाते हैं।
मैं समझता हूं कि प्रतिबंध बेहद कठोर शब्द होगा। इन चीजों पर प्रतिबंध लगाना काफी मुश्किल है क्योंकि अगर हम उन्हें विनियमित प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंधित करते हैं तो लोग गैर-नियमित साइटों पर जा सकते हैं जो और भी खतरनाक है। उदाहरण के लिए, गेमिंग पर केंद्र द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद लोगों ने उसे नहीं छोड़ा है। वे अभी भी सट्टा लगा रहे हैं। इसके लिए अब चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों के सर्वर का इस्तेमाल हो रहा है जहां पकड़े जाने पर भी हम कुछ नहीं कर सकते।
आप कैसे विनियमित करना चाहते हैं?
हमें सिफारिश करने से कुछ भी नहीं रोकता है। हम निवेशकों या अपने नवाचार से दूर होना नहीं चाहते हैं। इसलिए ऐसे विनियमन प्लेटफॉर्म से अलग होने चाहिए। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि माता-पिता, कानून बिरादरी, तकनीक क्षेत्र के लोग और प्लेटफॉर्म जैसे सभी हितधारकों से बात की जाए। हमारे पास सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम भी है जो केंद्र का विषय है।
ऐसे में हमें यह आकलन करना होगा उस विषय पर राज्य की क्या शक्तियां हैं। हम आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और सोशल मीडिया के जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग पर सिफारिश के लिए एक समिति गठित करेंगे।
यह एक बड़ा काम है और कोई भी ऐसा नहीं कह रहा है कि यह आसान होने वाला है। दरअसल यह सब उम्र के सत्यापन पर आधारित है और आप जानते हैं कि भारत में उम्र को सत्यापित करना कितना आसान है। मगर हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी निर्णय बेहद सोच-समझकर लिया जाए।
तत्काल कैसी चुनौतियां दिख रही हैं?
यह एक विचार-विमर्श की प्रक्रिया होनी चाहिए न कि सरकारी हुक्म की। इससे काफी कुछ सीखने के लिए भी मिलेगा। मैं एक स्तर पर डिजिटल इंडिया को बढ़ावा नहीं दे सकता और कहूं कि आप प्रौद्योगिकी का उपयोग नहीं कर सकते। मगर हमारा इरादा प्रौद्योगिकी का अच्छा उपयोग करना है। सबसे बड़ी चुनौती कानूनी पक्ष की है। यह भी एक चुनौती है कि क्या एक राज्य के रूप में हम कुछ कर सकते हैं।
मगर मुझे भरोसा है कि अच्छी समझ बनी रहेगी। दूसरी चुनौती आईडी यानी पहचान दस्तावेज संबंधी है। उम्र सत्यापन के व्यवहार से बचना बहुत आसान है। माता-पिता और शैक्षणिक संस्थानों को भी आगे आकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को व्यस्त रखा जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों को संभावित नुकसान से दूर रखना है। मगर हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा है कि उन्हें भागीदारी से दूर न रखा जाए। इसके लिए उचित नियमों एवं कानूनों की आवश्यकता है।
क्या आप दिशानिर्देश जारी करने की योजना बना रहे हैं?
मैं इस बारे में कुछ नहीं बताना चाहूंगा कि दिशानिर्देश क्या होंगे और हम उसे कैसे लाएंगे। मगर हम सभी हितधारकों से बात करेंगे और शैक्षणिक संस्थानों से भी राय लेंगे। प्राथमिक शिक्षा विभाग से भी राय ली जाएगी। मैं समझता हूं कि हम अगले पांच महीनों में दिशानिर्देश तैयार करने के करीब होंगे।
बच्चों के लिए सोशल मीडिया को विनियमित या प्रतिबंधित करने के बारे में बात करने वाले पहले राज्य के तौर पर आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही ही ऐसा कर चुका है और तमाम अन्य देश इस पर विचार कर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि कर्नाटक को कुछ कहने की जरूरत है। जहां तक प्रौद्योगिकी संबंधी नीतियों को लागू करने की बात है तो हम सबसे आगे हैं। हम दुनिया का चौथा सबसे बड़ा टेक्नॉलजी क्लस्टर हैं और इसलिए हमें ऐसी नीतियां लाने की जरूरत है जो प्रासंगिक हों। वास्तव में केंद्र सरकार को इसे लाना चाहिए था।