(अपर्णा बोस)
भुवनेश्वर, 24 सितंबर (भाषा) ओडिशा में नयागढ़ जिले की महिलाओं ने एक दशक लंबे संघर्ष के बाद, वन अधिकारों के लिए अग्रिम मोर्चे पर अभियान का नेतृत्व किया और 24 गांवों में वन संसाधनों के अधिकार हासिल किए।
वनों का संरक्षण करने के संघर्ष के बारे में रणपुर में प्रखंड स्तरीय महिला महासंघ की अध्यक्ष, शशि प्रधान ने कहा कि नयागढ़ जिले की महिलाएं वनों को ‘‘अपनी आजीविका के स्रोत’’ मानती हैं और 1984 से वनों का संरक्षण कर रही हैं।
शशि ने कहा, ‘‘महिलाएं 1984 से इन वनों का संरक्षण करती आ रही हैं। गांवों में रहने वाले लोगों को इन अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। महिलाओं ने लोगों के बीच वन अधिकार अधिनियम के बारे में जागरूकता अभियान चलाने का फैसला किया।’’
कोडालपल्ली और सिंदूरिया गांव को सामुदायिक और वन संसाधन अधिकार एक साथ दिए गए क्योंकि उन्होंने इन अधिकारों को हासिल करने के लिये संयुक्त रूप से अभियान का नेतृत्व किया था।
नयागढ़ जिले में वनों का प्रबंधन ज्यादातर महिलाओं द्वारा किये जाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि पुरुषों द्वारा वनों की देखभाल करने पर ‘कुप्रबंधन’ की समस्या पैदा हो रही थी।
उन्होंने कहा कि इसलिए महिलाओं ने यह जिम्मेदारी संभाली और अधिकारों के लिए मुहिम का नेतृत्व किया।
रणपुर की एक अन्य वनवासी, अनीता प्रधान ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘इन गांवों की महिलाओं ने हमेशा अपने हक के लिए लड़ाई लड़ी है। वनों पर अवैध कब्जा करने आये लोगों के वाहनों को भी महिलाओं ने जब्त कर लिया था।’’
जिले के 24 गांवों में दो नवंबर, 2021 को 14 सामुदायिक अधिकार (सीआर) और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआरआर) प्रदान किये गये थे।
अनुसूचित जनजाति और अन्य मूल वनवासी (वन अधिकार मान्यता अधिनियम) के तहत इन गांवों को ये अधिकार दिये गए।
इससे पहले, पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने कहा कि वनों को ‘‘आदिवासी समुदायों के आवास’’ के तौर पर देखते हुए वन संरक्षण को ‘‘स्थानीय आजीविका बनाने का तरीका’’ माना जाना चाहिए।
‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (सीएसई) की महानिदेशक नारायण ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन के प्रश्न का जवाब देने के लिए वृक्ष अहम हैं और प्रदूषण को कम करने के लिए वन बहुत महत्वपूर्ण हैं।’’
भाषा फाल्गुनी सुभाष